रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 4 — खर-दूषण का सेना सजाकर युद्ध को चलना; अनर्थ, पाप और सब प्रकार की हानि का सूचक अपशकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। यह पहले सप्तक का चौथा दोहा है। तृतीय सर्ग में शूर्पणखा, खर-दूषण और सीता-हरण जैसे प्रसंग आते हैं, इसलिए इसके कई दोहे अपशकुन सूचक हैं।
खर-दूषण का सेना सजाकर चलना — सब प्रकार की हानि का सूचक।
मूल दोहा: खर दूषन देखी दुखित, चले साजि सब साज। अनरथ असगुन अघ असुभ अनभल अखिल अकाज॥४॥
शब्दार्थ:
- खर दूषन = खर और दूषण राक्षस
- देखी दुखित = दुःखी देखा
- साजि सब साज = सारा साज-सामान सजाकर
- अनरथ = अनर्थ
- असगुन = अपशकुन
- अघ = पाप
- असुभ = अशुभ
- अनभल = अहित
- अखिल अकाज = सब प्रकार की हानि
चले साजि सब साज = सेना का सारा साज सजाकर चले। अखिल अकाज = सब प्रकार की हानि होगी।
भावार्थ / व्याख्या:
खर-दूषण ने शूर्पणखा को दुःखी देखा तो सेना का सब साज सजाकर युद्ध के लिए चल पड़े।
तुलसीदास जी इस अपशकुन का फल बताते हैं — यह बुराइयों, पाप, अशुभ, अहित तथा सब प्रकार की हानि बतलाता है। ध्यान दीजिए, इस पंक्ति में छह नकारात्मक शब्द एक साथ आए हैं, सब ‘अ’ से आरंभ होते हुए — यह तुलसीदास जी की काव्य-कुशलता है और चेतावनी की गंभीरता भी।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा बदले या क्रोध में उठाए जाने वाले कदम के विरुद्ध चेतावनी है। खर-दूषण भावावेश में निकले और नष्ट हो गए। संदेश स्पष्ट है — क्रोध में उठाया गया कदम आत्मघाती होता है।
शकुन फल:
यह अपशकुन सब प्रकार की हानि का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सतर्कता:
- क्रोध या बदले की भावना से उठाया जा रहा कदम
- किसी से टकराव, झगड़ा या मुकदमा
- बड़ी तैयारी के साथ किया जा रहा आक्रामक कार्य
- किसी के पक्ष में लड़ने या हस्तक्षेप करने का निर्णय
- बड़े निवेश या संसाधन लगाने वाला जोखिम
इस दोहे के आने पर सब प्रकार की हानि की चेतावनी है। क्रोध या भावावेश में कोई कदम न उठाएँ। शांत होकर पुनर्विचार करें — यही एकमात्र बचाव है।
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