रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 3 — शूर्पणखा के नाक-कान कटने का प्रसंग; यात्रा के लिए स्पष्ट निषेध करने वाला अपशकुन।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। यह पहले सप्तक का तीसरा दोहा है। तृतीय सर्ग में शूर्पणखा, खर-दूषण और सीता-हरण जैसे प्रसंग आते हैं, इसलिए इसके कई दोहे अपशकुन सूचक हैं।
नाक-कान कटने का प्रसंग — यात्रा के लिए स्पष्ट निषेध।
मूल दोहा: नाक कान बिनु बिकल भइ बिकट कराल कुरूप। कुसगुन पाउ न देब मग, पग पग कंटक कूप॥३॥
शब्दार्थ:
- नाक कान बिनु = नाक-कान के बिना
- बिकल = व्याकुल
- भइ = हो गई
- बिकट = अटपटा
- कराल = भयंकर
- कुरूप = भद्दा
- पाउ न देब मग = मार्ग में पैर मत रखना
- पग पग = पद-पद पर
- कंटक = काँटे
- कूप = कुएँ, गड्ढे
कुसगुन पाउ न देब मग = यह अपशकुन है, यात्रा के लिए मार्ग में पैर मत रखना। पग पग कंटक कूप = पद-पद पर काँटे और गड्ढे हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
शूर्पणखा नाक-कान काटे जाने से व्याकुल हो गई और उसका रूप अटपटा, भयंकर तथा भद्दा हो गया।
तुलसीदास जी इस शकुन का फल अत्यंत स्पष्ट शब्दों में देते हैं — यह अपशकुन है, यात्रा के लिए मार्ग में पैर मत रखना, क्योंकि पद-पद पर काँटे और गड्ढे अर्थात् विघ्न-बाधाएँ हैं।
रामाज्ञा प्रश्न में यह उन गिने-चुने दोहों में है जो सीधा निषेध करते हैं। यहाँ कोई शर्त या विकल्प नहीं दिया गया — स्पष्ट मना किया गया है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा यात्रा और नए आरंभ के प्रश्नों में स्पष्ट ‘नहीं’ कहता है।
शकुन फल:
यह अपशकुन है और यात्रा के लिए स्पष्ट निषेध करता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- यात्रा या प्रस्थान — इस समय न करें
- स्थान परिवर्तन या नई जगह जाना
- कोई नया कार्य या उद्यम आरंभ करना
- ऐसा मार्ग जिसमें बाधाओं की आशंका हो
- अपमान या मान-हानि का जोखिम
इस दोहे के आने पर यात्रा और नया आरंभ दोनों टाल देना चाहिए। पद-पद पर बाधाएँ आएँगी। कुछ समय प्रतीक्षा करें और फिर पुनः विचार करें।
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