रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 1 — श्रीराम के युवराज-अभिषेक का मंगलमय समय; संपत्ति, सिद्धि और मंगल का शुभ शकुन।
गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। यह पहले सप्तक का पहला दोहा है। द्वितीय सर्ग श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी से लेकर वनगमन तक के प्रसंगों को समेटे हुए है।
द्वितीय सर्ग का आरंभ — श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी का मंगलमय प्रसंग।
मूल दोहा: समय राम जुबराज कर मंगल मोद निकेतु। सगुन सुहावन संपदा सिद्धि सुमंगल हेतु॥१॥
शब्दार्थ:
- समय = अवसर, काल
- जुबराज = युवराज पद
- कर = का
- निकेतु = धाम, घर
- सुहावन = सुहावना, मनोहर
- संपदा = संपत्ति
- सिद्धि = सफलता
- हेतु = कारण, देने वाला
समय राम जुबराज कर = श्रीराम के युवराज-पद पर अभिषेक का समय। संपदा सिद्धि सुमंगल हेतु = संपत्ति, सिद्धि और मंगलों का कारण है।
भावार्थ / व्याख्या:
द्वितीय सर्ग का आरंभ अत्यंत मंगलमय है। श्रीराम के युवराज-पद पर अभिषेक का समय आनंद और मंगल का धाम है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन सुहावना है और संपत्ति, सिद्धि तथा सभी मंगलों का कारण है। युवराज-पद का अभिषेक केवल एक पद की प्राप्ति नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और सम्मान दोनों का आरंभ है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा पदोन्नति, नई ज़िम्मेदारी और प्रतिष्ठा से जुड़े प्रश्नों में विशेष शुभ है। यह संकेत देता है कि जो पद, अधिकार या उत्तरदायित्व मिलने वाला है, वह संपत्ति और सफलता दोनों लेकर आएगा।
शकुन फल:
यह शकुन सुहावना है और संपत्ति-सिद्धि का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- पदोन्नति, नई नियुक्ति या ज़िम्मेदारी
- व्यापार या संस्था में नेतृत्व की भूमिका
- संपत्ति, धन या समृद्धि की प्राप्ति
- सम्मान, उपाधि या सार्वजनिक मान्यता
- किसी शुभ कार्य का औपचारिक शुभारंभ
इस दोहे के आने पर संपत्ति, सिद्धि और मंगल का शुभ संकेत मिलता है। नई ज़िम्मेदारी स्वीकार करना लाभदायक रहेगा।
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