रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 2 — देव-माया के वश कैकेयी की कुचाल; छल और शीघ्र आने वाली बुराई की चेतावनी।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। यह पहले सप्तक का दूसरा दोहा है। द्वितीय सर्ग श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी से लेकर वनगमन तक के प्रसंगों को समेटे हुए है।
कैकेयी की कुचाल का प्रसंग — छल और बुराई की चेतावनी।
मूल दोहा: सुर माया बस केकई कुसमयँ किन्हि कुचालि। कुटिल नारि मिस छलु अनभल आजु कि कालि॥२॥
शब्दार्थ:
- सुर माया = देवताओं की माया
- बस = वश में होकर
- केकई = कैकेयी
- कुसमयँ = बुरे समय में, अनवसर
- कुचालि = कुचाल, बुरी चाल
- कुटिल नारि = दुष्ट स्त्री
- मिस = बहाने
- छलु = छल
- अनभल = बुराई, अहित
सुर माया बस केकई = देवताओं की माया के वश होकर कैकेयी ने। अनभल आजु कि कालि = आज या कल में ही बुराई होने वाली है।
भावार्थ / व्याख्या:
देवताओं की माया के वश होकर महारानी कैकेयी ने बुरे समय में कुचाल चली। तुलसीदास जी इसका शकुन-फल बताते हैं — किसी दुष्ट स्त्री के बहाने छल होगा और शीघ्र ही बुराई होने वाली है।
यह दोहा जीवन की एक कठोर सच्चाई की ओर संकेत करता है — कई बार संकट बाहर से नहीं, अपने ही घर के भीतर से आता है, और उस व्यक्ति से आता है जिस पर सबसे अधिक विश्वास था।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा स्पष्ट चेतावनी है। यह बताता है कि निकट भविष्य में किसी के छल या षड्यंत्र से हानि की संभावना है। यह समय अत्यंत सतर्क रहने का है — विशेषकर उन बातों में जहाँ किसी पर अंधा विश्वास किया जा रहा हो।
शकुन फल:
यह शकुन छल और अहित की चेतावनी देता है। निम्नलिखित प्रश्नों में सतर्क रहें:
- किसी पर विश्वास करके सौंपा जा रहा कार्य या धन
- घर या परिवार के भीतर उत्पन्न मतभेद
- साझेदारी या समझौते में छिपी शर्तें
- कोई ऐसा वादा जो लिखित न हो
- निकट भविष्य में अचानक बदलने वाली स्थिति
इस दोहे के आने पर छल और अहित की आशंका है। किसी भी बात को लिखित रूप में लें, अंधा विश्वास न करें और अगले कुछ समय तक बड़ा निर्णय टाल दें।
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