रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 2 — श्रीराम के कर्णवेध, मुंडन और यज्ञोपवीत संस्कार; संस्कार व मांगलिक कार्यों का शुभ शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। प्रथम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह दूसरा दोहा शुभारंभ, यात्रा और धर्म-कार्य से जुड़े प्रश्नों में विशेष रूप से देखा जाता है।
यह दोहा संस्कारों — कर्णवेध, मुंडन और यज्ञोपवीत — से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देता है।
मूल दोहा: करन बेध चूड़ा करन, श्रीरघुबर उपबीत। समय सकल कल्यानमय, मंजुल मंगल गीत॥२॥
शब्दार्थ:
- करन बेध = कर्णवेध संस्कार (कान छिदवाना)
- चूड़ा करन = चूड़ाकर्म, मुंडन संस्कार
- उपबीत = यज्ञोपवीत, जनेऊ संस्कार
- समय = अवसर, काल
- कल्यानमय = कल्याण से भरा हुआ
- मंजुल = सुंदर, मनोहर
समय सकल कल्यानमय = वह सारा समय कल्याणमय था। मंजुल मंगल गीत = सुंदर मंगलगीत गाए गए।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीरघुनाथजी के कर्णवेध संस्कार, मुंडन संस्कार और यज्ञोपवीत संस्कार के समय समस्त वातावरण कल्याणमय था और सुंदर मंगलगीत गाए गए।
भारतीय परंपरा में सोलह संस्कार जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को पवित्र बनाते हैं। यह दोहा बताता है कि जब स्वयं भगवान ने अवतार लेकर इन संस्कारों का पालन किया, तो साधारण मनुष्य के लिए इनका महत्व कितना अधिक है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन सभी प्रश्नों में शुभ है जो संस्कार, शुभ मुहूर्त या मांगलिक कार्य से जुड़े हैं। ‘समय सकल कल्यानमय’ का अर्थ है कि चुना गया समय स्वयं शुभ है — मुहूर्त को लेकर संशय न करें।
शकुन फल:
यह शकुन संस्कार और मांगलिक कार्यों के लिए विशेष शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- कर्णवेध, मुंडन या यज्ञोपवीत संस्कार
- विवाह, सगाई या अन्य मांगलिक कार्य
- गृह प्रवेश, नामकरण या अन्नप्राशन
- शुभ मुहूर्त या तिथि का चयन
- किसी धार्मिक आयोजन का शुभारंभ
इस दोहे के आने पर संस्कार और मांगलिक कार्यों में फल शुभ होगा। चुना हुआ समय अनुकूल है, बिना संशय के आयोजन करें।
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