रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 7 श्लोक 5 — हनुमान, भरत, राम-सीता को हृदय में धारण कर और लक्ष्मण-स्मरण से शकुन-विचार कहने का विधान।
तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। सप्तम सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें पाँचवाँ दोहा — यह सर्ग पूरे ग्रंथ के प्रयोग की कुंजी माना जाता है।
हृदय में इष्ट को धारण कर शकुन का बखान करो।
मूल दोहा: हनूमान सानुज भरत, राम सीय उर आनि। लषन सुमिरि तुलसी कहत, सगुन बिचारु बखानि॥५॥
शब्दार्थ:
- हनूमान = हनुमानजी
- सानुज भरत = छोटे भाई सहित भरतजी
- राम सीय = श्रीराम-सीताजी
- उर आनि = हृदय में लाकर
- लषन सुमिरि = लक्ष्मणजी का स्मरण करके
- तुलसी कहत = तुलसीदास जी कहते हैं
- सगुन बिचारु = शकुन का विचार
- बखानि = बखान करो, कहो
हनूमान सानुज भरत, राम सीय उर आनि = हनुमानजी, शत्रुघ्न सहित भरतजी और राम-सीता को हृदय में लाकर। लषन सुमिरि तुलसी कहत, सगुन बिचारु बखानि = लक्ष्मणजी का स्मरण करके शकुन का विचार कहो।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीहनुमानजी, छोटे भाई शत्रुघ्न सहित भरतजी तथा श्रीराम-सीताजी को हृदय में लाकर और श्रीलक्ष्मणजी का स्मरण करके शकुन का विचार बखान करना चाहिए।
पिछले दोहे में स्मरण की सूची थी और यहाँ ‘उर आनि’ अर्थात् हृदय में लाना है। यह भेद महत्वपूर्ण है — केवल नाम लेना और हृदय में स्वरूप बसाना दो अलग बातें हैं।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा शकुन-वक्ता के लिए भी एक शिक्षा है — जब आप किसी को उसके प्रश्न का उत्तर बता रहे हों, तब मन में इष्ट को रखें, ताकि जो कहा जाए वह सत्य और हितकारी हो।
शकुन फल:
यह शकुन हृदय में इष्ट धारण कर विचार करने का निर्देश देता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- किसी को सलाह या मार्गदर्शन देना
- शकुन या भविष्य-कथन की ज़िम्मेदारी
- हृदय से किया जाने वाला स्मरण
- किसी महत्वपूर्ण बात को कहने से पहले की तैयारी
- सत्य और हितकारी वचन बोलना
इस दोहे के आने पर हृदय में इष्ट को धारण करके ही बात कहें। जो कहा जाए वह सत्य और हितकारी हो — यही इस दोहे का निर्देश है।
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