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रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 4

रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 4 — मंथरा और कैकेयी की कुचाल पर व्याधि-विपत्ति का देवकृत होना; निमित्त और कारण का शकुन।

4

सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। इस छठे सप्तक के चौथा दोहे में सप्तम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रश्न के अनुरूप आया दोहा ही सत्य उत्तर है।

मंथरा और कैकेयी की कुचाल — व्याधि और विपत्ति देवकृत हैं।

मूल दोहा: मंद मंथरा मोहबस, कुटिल कैकई कीन्ह। ब्याधि बिपति सब देवकृत, समय सगुन कहि दीन्ह॥४॥

शब्दार्थ:

  • मंद मंथरा = मंदबुद्धि मंथरा
  • मोहबस = मोह के वश
  • कुटिल कैकई = कुटिल कैकेयी
  • कीन्ह = किया
  • ब्याधि = रोग
  • बिपति = विपत्ति
  • सब देवकृत = सब देवताओं द्वारा किया
  • समय सगुन = इस समय का शकुन
  • कहि दीन्ह = कह दिया

मंद मंथरा मोहबस, कुटिल कैकई कीन्ह = मोहवश मंदबुद्धि मंथरा और कुटिल कैकेयी ने यह किया। ब्याधि बिपति सब देवकृत, समय सगुन कहि दीन्ह = रोग और विपत्ति सब देवकृत हैं, यह शकुन कह दिया गया।

भावार्थ / व्याख्या:

मोह के वश मंदबुद्धि मंथरा और कुटिल कैकेयी ने वह कुचाल की, परंतु वास्तव में रोग और विपत्ति सब देवताओं द्वारा किए गए थे — यह इस समय का शकुन कह दिया गया।

यह दोहा एक गहरी बात कहता है। ऊपर से देखने पर दोषी मंथरा और कैकेयी दिखती हैं, परंतु तुलसीदास जी बताते हैं कि वे भी निमित्त मात्र थीं।

शकुन की दृष्टि से इसका व्यावहारिक अर्थ यह है — जो व्यक्ति आपके संकट का कारण दिख रहा है, वह वास्तविक कारण नहीं हो सकता। ऐसे समय में उससे बदला लेने के बजाय स्थिति को समझना और उपाय करना अधिक उपयोगी है।

शकुन फल:

यह शकुन बताता है कि रोग और विपत्ति देवकृत हैं। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • रोग या बीमारी का अकारण आना
  • किसी की कुचाल या षड्यंत्र से आया संकट
  • परिवार में किसी के कारण उत्पन्न विवाद
  • बदला लेने की भावना वाली स्थिति
  • संकट के वास्तविक कारण की खोज

इस दोहे के आने पर जो व्यक्ति दोषी दिख रहा है वह निमित्त मात्र हो सकता है। बदले की भावना छोड़ें और उपाय पर ध्यान दें।

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