रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 2 — अयोध्या-प्रवेश का आनंद और राम-तिलक का अवसर; सुख, संतोष और सुकाल का शुभ शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। इस छठे सप्तक के दूसरा दोहे में सप्तम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रश्न के अनुरूप आया दोहा ही सत्य उत्तर है।
अयोध्या-प्रवेश और राम-तिलक का अवसर — सुख, संतोष और सुकाल।
मूल दोहा: अवध प्रवेस अनंदु बड़, सगुन सुमंगल माल। राम तिलक अवसर कहब, सुख संतोष सुकाल॥२॥
शब्दार्थ:
- अवध प्रवेस = अयोध्या में प्रवेश
- अनंदु बड़ = बड़ा आनंद
- सुमंगल माल = मंगलों की माला
- राम तिलक = श्रीराम का राजतिलक
- अवसर = अवसर
- कहब = कहना चाहिए
- सुख संतोष = सुख और संतोष
- सुकाल = सुभिक्ष, अच्छा समय
अवध प्रवेस अनंदु बड़, सगुन सुमंगल माल = अयोध्या-प्रवेश का बड़ा आनंद, यह मंगलों की माला है। राम तिलक अवसर कहब, सुख संतोष सुकाल = राम-तिलक का अवसर — सुख, संतोष और सुकाल।
भावार्थ / व्याख्या:
अयोध्या में प्रवेश का बड़ा आनंद है और यह शकुन मंगलों की माला है। श्रीराम के राजतिलक का यह अवसर सुख, संतोष तथा सुकाल का सूचक कहना चाहिए।
पिछले दोहे में राजा के बिना उजड़ी अयोध्या थी और यहाँ राजा का प्रवेश और राजतिलक है। यह विपरीत जोड़ी तुलसीदास जी की रचना-शैली की विशेषता है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अत्यंत शुभ है। ‘सुमंगल माल’ अर्थात् एक नहीं, अनेक मंगलों की शृंखला। यह उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ नेतृत्व की स्थापना, नया पद या घर वापसी विषय हो।
शकुन फल:
यह शकुन सुख, संतोष और सुकाल का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- नए पद, अधिकार या नेतृत्व की स्थापना
- घर वापसी या नए घर में प्रवेश
- अव्यवस्था के बाद व्यवस्था की स्थापना
- समृद्धि और अच्छे समय का आरंभ
- कोई शुभ आयोजन या समारोह
इस दोहे के आने पर सुख, संतोष और सुकाल का संकेत है। मंगलों की माला है — एक नहीं, कई शुभ अवसर आएँगे।
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