रामायण, महाभारत, गीता, वेद तथा पुराण की कथाएं

रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 1

रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 1 — राजा के बिना उजड़ी अयोध्या और दुःखी प्रजा; राजभंग की स्थिति में ग्रह-चाल विचारने का शकुन।

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इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। इस छठे सप्तक के पहला दोहे में सप्तम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रश्न के अनुरूप आया दोहा ही सत्य उत्तर है।

राजा के बिना उजड़ा देश — ग्रह-चाल का विचार करो।

मूल दोहा: उदबस अवध नरेस बिनु, देस दुखी नर नारि। राजभंग कुसमाज बड़, गत ग्रह चालि बिचारि॥१॥

शब्दार्थ:

  • उदबस = उजाड़, वीरान
  • अवध = अयोध्या
  • नरेस बिनु = राजा के बिना
  • देस दुखी = देश दुःखी
  • नर नारि = स्त्री-पुरुष
  • राजभंग = राज्य का भंग होना
  • कुसमाज = बुरी स्थिति
  • गत ग्रह चालि = ग्रहों की चाल
  • बिचारि = विचार करके

उदबस अवध नरेस बिनु, देस दुखी नर नारि = राजा के बिना अयोध्या उजाड़ है, देश के स्त्री-पुरुष दुःखी हैं। राजभंग कुसमाज बड़, गत ग्रह चालि बिचारि = राज्य-भंग की बुरी स्थिति है, ग्रहों की चाल का विचार करो।

भावार्थ / व्याख्या:

राजा के बिना अयोध्या उजाड़ है और देश के स्त्री-पुरुष दुःखी हैं। राज्य-भंग की यह बड़ी बुरी स्थिति है — ऐसे समय में ग्रहों की चाल का विचार करना चाहिए।

यह नेतृत्व-शून्यता का चित्र है। जब कोई संस्था, परिवार या राज्य नेतृत्व-विहीन हो जाए, तो व्यवस्था बिखर जाती है।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है और उन प्रश्नों में चेतावनी देता है जहाँ नेतृत्व, मुखिया या ज़िम्मेदार व्यक्ति का अभाव हो। तुलसीदास जी का निर्देश व्यावहारिक है — ऐसे समय में जल्दबाज़ी न करें, ग्रह-दशा और समय का विचार करके ही आगे बढ़ें।

शकुन फल:

यह शकुन नेतृत्व-शून्यता और अव्यवस्था का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • परिवार या संस्था में मुखिया का अभाव
  • नेतृत्व या ज़िम्मेदारी को लेकर अनिश्चितता
  • किसी के चले जाने से बिखरी व्यवस्था
  • राज्य, सत्ता या पद का परिवर्तन
  • ग्रह-दशा या समय के विचार की आवश्यकता

इस दोहे के आने पर अव्यवस्था का संकेत है। जल्दबाज़ी न करें — समय और परिस्थिति का विचार करके ही निर्णय लें। पहले नेतृत्व की व्यवस्था करें।

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