रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 5 श्लोक 3 — खेती-व्यापार का न चलना और सारे उपायों की निष्फलता; कुसमय में राम-नाम ही अवलंब।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। सप्तम सर्ग के पाँचवें सप्तक का तीसरा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें शकुन के निर्णय की कसौटी बताई गई है।
सारे उपाय निष्फल — कुसमय है, राम-नाम ही अवलंब।
मूल दोहा: खेती बनिज न भीख भलि, अफल उपाय कदंब। कुसमय जानब बाम बिधि, राम नाम अवलंब॥३॥
शब्दार्थ:
- खेती बनिज न = खेती और व्यापार नहीं चलेंगे
- भीख भलि = भिक्षा ही भली
- अफल = निष्फल
- उपाय कदंब = उपायों का समूह
- कुसमय = बुरा समय
- जानब = जानना
- बाम बिधि = विधाता प्रतिकूल
- राम नाम अवलंब = राम-नाम ही सहारा
खेती बनिज न, भीख भलि, अफल उपाय कदंब = खेती-व्यापार नहीं चलेंगे, सारे उपाय निष्फल हैं। कुसमय जानब बाम बिधि, राम नाम अवलंब = कुसमय है, विधाता प्रतिकूल है — राम-नाम ही सहारा है।
भावार्थ / व्याख्या:
जब खेती और व्यापार दोनों न चलें और सारे उपायों का समूह निष्फल हो जाए, तब समझना चाहिए कि कुसमय है और विधाता प्रतिकूल है।
ऐसी स्थिति में तुलसीदास जी एकमात्र उपाय बताते हैं — राम-नाम ही अवलंब है।
यह अत्यंत ईमानदार दोहा है। यह झूठा आश्वासन नहीं देता कि ‘बस एक और प्रयास करो’। जब सारे उपाय समाप्त हो जाएँ तब भागदौड़ बढ़ाना नहीं, बल्कि रुकना और आश्रय लेना चाहिए। शकुन की दृष्टि से इसका संदेश है — इस समय नए प्रयत्न न करें, धैर्य रखें और समय बदलने दें।
शकुन फल:
यह शकुन कुसमय और उपायों की निष्फलता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- ऐसी स्थिति जहाँ सारे उपाय विफल हो चुके हों
- खेती, व्यापार या जीविका में मंदी
- बार-बार असफल हो रहा प्रयास
- आर्थिक तंगी का लंबा दौर
- नया प्रयत्न करें या रुकें — इस दुविधा में
इस दोहे के आने पर कुसमय है — नए प्रयत्न और निवेश न करें। यह भागदौड़ का नहीं, धैर्य और आश्रय का समय है। राम-नाम ही सहारा है।
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