रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 5 श्लोक 4 — पुरुषार्थ, स्वार्थ और परमार्थ तीनों की सिद्धि; सीताराम-स्मरण से सब सुलभ होने का शुभ शकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। सप्तम सर्ग के पाँचवें सप्तक का चौथा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें शकुन के निर्णय की कसौटी बताई गई है।
पुरुषार्थ, स्वार्थ और परमार्थ — सीताराम के स्मरण से सब सिद्धि सुलभ।
मूल दोहा: पुरुषारथ स्वारथ सकल, परमारथ परिनाम। सुलभ सिद्धि सब सगुन सुभ, सुमिरत सीताराम॥४॥
शब्दार्थ:
- पुरुषारथ = पुरुषार्थ, परिश्रम
- स्वारथ = स्वार्थ, अपना हित
- सकल = सब
- परमारथ = परमार्थ, दूसरों का हित
- परिनाम = परिणाम में
- सुलभ सिद्धि = सहज सिद्धि
- सगुन सुभ = शुभ शकुन
- सुमिरत = स्मरण करने से
पुरुषारथ स्वारथ सकल, परमारथ परिनाम = पुरुषार्थ, स्वार्थ और परमार्थ — सब परिणाम में सिद्ध होंगे। सुलभ सिद्धि सब सगुन सुभ, सुमिरत सीताराम = सीताराम के स्मरण से सब सिद्धि सुलभ है।
भावार्थ / व्याख्या:
पुरुषार्थ अर्थात् परिश्रम, स्वार्थ अर्थात् अपना हित और परमार्थ अर्थात् दूसरों का हित — ये तीनों परिणाम में सिद्ध होते हैं। श्रीसीताराम का स्मरण करने से सब सिद्धि सुलभ है और यह शकुन शुभ है।
इस दोहे में जीवन के तीन आयाम एक साथ आए हैं। सामान्यतः इन तीनों में टकराव माना जाता है — जो अपना हित देखता है वह परमार्थ नहीं कर पाता।
परंतु तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताराम के स्मरण से तीनों एक साथ सिद्ध होते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा अत्यंत शुभ है और उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ अपने हित और दूसरों के हित के बीच संतुलन बनाना हो।
शकुन फल:
यह शुभ शकुन सब सिद्धि सुलभ होने का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- परिश्रम का उचित फल मिलना
- अपने हित और दूसरों के हित में संतुलन
- व्यवसाय के साथ सेवा या परोपकार
- जीवन के तीनों आयामों में सफलता
- कोई भी कार्य जिसमें सब पक्ष सधने हों
इस दोहे के आने पर सब सिद्धि सुलभ है। पुरुषार्थ, स्वार्थ और परमार्थ — तीनों सधेंगे। सीताराम का स्मरण करते हुए आगे बढ़ें।
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