रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 5 श्लोक 5 — भाग्य का साथ छोड़ना और आलस्य से उपायों का ग्रसा जाना; शरणागति का उपाय बताने वाला शकुन।
तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। सप्तम सर्ग के पाँचवें सप्तक का पाँचवाँ दोहा प्रस्तुत है, जिसमें शकुन के निर्णय की कसौटी बताई गई है।
भाग्य साथ छोड़े और आलस्य घेरे — राम की शरण में आओ।
मूल दोहा: भागु भाग तजि भाल थलु, आलस ग्रसे उपाउ। असुभ अमंगल सगुन सुनि, सरन राम के आउ॥५॥
शब्दार्थ:
- भागु = भाग्य
- भाग तजि = साथ छोड़कर भाग जाए
- भाल थलु = भाल-स्थल, ललाट
- आलस = आलस्य
- ग्रसे उपाउ = उपायों को ग्रस ले
- असुभ अमंगल = अशुभ और अमंगल
- सगुन सुनि = शकुन सुनकर
- सरन राम के आउ = श्रीराम की शरण में आओ
भागु भाग तजि भाल थलु, आलस ग्रसे उपाउ = भाग्य ललाट का साथ छोड़ दे और आलस्य उपायों को ग्रस ले। असुभ अमंगल सगुन सुनि, सरन राम के आउ = यह अशुभ अमंगल शकुन सुनकर श्रीराम की शरण में आओ।
भावार्थ / व्याख्या:
जब भाग्य ललाट का साथ छोड़ दे और आलस्य सारे उपायों को ग्रस ले, तब यह अशुभ और अमंगल शकुन समझकर श्रीराम की शरण में आ जाना चाहिए।
इस दोहे में दो कारण बताए गए हैं — एक बाहरी और एक भीतरी। भाग्य का साथ छोड़ना हमारे वश में नहीं, परंतु आलस्य हमारे भीतर की समस्या है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है, परंतु इसमें आत्म-निरीक्षण का संकेत भी है — कहीं आपकी समस्या भाग्य की नहीं, आलस्य की तो नहीं? उपाय स्पष्ट है — शरणागति। जब स्वयं के प्रयत्न काम न करें, तब समर्पण ही मार्ग है।
शकुन फल:
यह अशुभ अमंगल शकुन है — शरणागति का उपाय बताता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- भाग्य का साथ न देने की स्थिति
- आलस्य या टालमटोल से रुका हुआ कार्य
- सारे उपायों का निष्फल होना
- आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता
- किसी की शरण या सहायता लेने का निर्णय
इस दोहे के आने पर स्थिति अशुभ है। पहले जाँचें — समस्या भाग्य की है या आलस्य की। फिर श्रीराम की शरण लें, यही एकमात्र उपाय बताया गया है।
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