रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 5 श्लोक 2 — दसों दिशाओं में दुःख-दरिद्रता, पर अब श्रीराम की सम्मुख दृष्टि; कठिनाई के अंत का शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। सप्तम सर्ग के पाँचवें सप्तक का दूसरा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें शकुन के निर्णय की कसौटी बताई गई है।
दसों दिशाओं में दुःख — पर अब श्रीराम ने दृष्टि फेरी है।
मूल दोहा: दस दिसि दुख दारिद दुरित, दुसह दसा दिन दोष। फेरे लोचन राम अब, सनमुख साज सरोष॥२॥
शब्दार्थ:
- दस दिसि = दसों दिशाओं में
- दुख दारिद = दुःख और दरिद्रता
- दुरित = पाप
- दुसह दसा = असहनीय दशा
- दिन दोष = दिनों का दोष
- फेरे लोचन = दृष्टि फेरी है
- सनमुख = सम्मुख
- साज सरोष = रोष सहित तैयार
दस दिसि दुख दारिद दुरित, दुसह दसा दिन दोष = दसों दिशाओं में दुःख, दरिद्रता, पाप और असहनीय दशा। फेरे लोचन राम अब, सनमुख साज सरोष = पर अब श्रीराम ने दृष्टि फेरी है और सम्मुख होकर रोष सहित तैयार हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
दसों दिशाओं में दुःख, दरिद्रता, पाप और असहनीय दशा है — दिनों का दोष चल रहा है।
परंतु दोहे का दूसरा भाग आशा देता है — अब श्रीराम ने दृष्टि फेरी है और वे सम्मुख होकर, रोष सहित, कष्टों के विरुद्ध तैयार हैं।
इस दोहे की संरचना ध्यान देने योग्य है — पहली पंक्ति में ‘द’ अक्षर की आवृत्ति से दुःख की गहराई दिखाई गई है और दूसरी पंक्ति में उसका समाधान। शकुन की दृष्टि से यह मिश्रित परंतु आशावादी संकेत है — कठिनाई चरम पर है, पर सहायता आ रही है।
शकुन फल:
यह शकुन चरम कठिनाई के बाद सहायता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- चारों ओर से घिरी हुई कठिन परिस्थिति
- लंबे समय से चली आ रही दरिद्रता या तंगी
- असहनीय लगने वाली स्थिति
- किसी बड़ी सहायता की प्रतीक्षा
- कठिन दौर के अंत की आशा
इस दोहे के आने पर कठिनाई अपने चरम पर है, परंतु सहायता आ रही है। धैर्य रखें — श्रीराम ने अब आपकी ओर दृष्टि फेरी है।
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