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रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 1

रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 5 श्लोक 1 — बड़ा क्लेश पर थोड़ा कार्य, बड़ी आशा पर थोड़ा लाभ; समयानुसार निर्वाह करने का शकुन।

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गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। सप्तम सर्ग के पाँचवें सप्तक का पहला दोहा प्रस्तुत है, जिसमें शकुन के निर्णय की कसौटी बताई गई है।

बड़ा क्लेश, छोटा कार्य — समय के अनुसार निर्वाह करो।

मूल दोहा: बड़ कलेस कारज अलप, बड़ी आस लहु लाहु। उदासीन सीतारमन, समय सरिस निरबाहु॥१॥

शब्दार्थ:

  • बड़ कलेस = बड़ा कष्ट
  • कारज अलप = कार्य थोड़ा
  • बड़ी आस = बड़ी आशा
  • लहु लाहु = थोड़ा लाभ
  • उदासीन = उदासीन, तटस्थ
  • सीतारमन = सीतापति श्रीराम
  • समय सरिस = समय के अनुसार
  • निरबाहु = निर्वाह करो

बड़ कलेस कारज अलप, बड़ी आस लहु लाहु = कष्ट बड़ा पर कार्य थोड़ा, आशा बड़ी पर लाभ थोड़ा। समय सरिस निरबाहु = समय के अनुसार निर्वाह करो।

भावार्थ / व्याख्या:

इस दोहे में परिश्रम और फल का असंतुलन दिखाया गया है — कष्ट बड़ा है पर कार्य थोड़ा हुआ, आशा बड़ी थी पर लाभ थोड़ा मिला।

ऐसे समय में श्रीसीतारमण उदासीन अर्थात् तटस्थ रहते हैं और तुलसीदास जी सलाह देते हैं कि समय के अनुसार निर्वाह करो।

यह अत्यंत यथार्थवादी दोहा है। जीवन में कुछ समय ऐसे आते हैं जब मेहनत के अनुपात में फल नहीं मिलता। शकुन की दृष्टि से इसका संदेश है — इस समय बड़ी अपेक्षा न रखें, जो मिल रहा है उसी में निर्वाह करें और समय बदलने की प्रतीक्षा करें।

शकुन फल:

यह शकुन परिश्रम की तुलना में कम फल का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • मेहनत के अनुपात में कम मिलने वाला फल
  • बड़ी अपेक्षा वाला कोई निर्णय
  • ऐसा कार्य जिसमें लागत अधिक और लाभ कम
  • धैर्य और समायोजन की आवश्यकता
  • प्रतीक्षा करें या आगे बढ़ें — इस दुविधा में

इस दोहे के आने पर बड़ी अपेक्षा न रखें। जो मिल रहा है उसी में निर्वाह करें और समय बदलने की प्रतीक्षा करें — यही इस काल की रणनीति है।

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