रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 1 — मध्यम दिन, मध्यम दशा और मध्यम समाज; कार्य भी मध्यम ही होने का संतुलित शकुन।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। यह दोहा सप्तम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से पहला है — यहाँ ध्यान, श्रद्धा और एकाग्रता पर बल दिया गया है।
मध्यम दिन, मध्यम दशा — कार्य भी मध्यम ही समझो।
मूल दोहा: मध्यम दिन मध्यम दसा, मध्यम सकल समाज। नाइ माथ रघुनाथ पद, जानब मध्यम काज॥१॥
शब्दार्थ:
- मध्यम दिन = साधारण दिन
- मध्यम दसा = साधारण दशा
- मध्यम सकल समाज = सारा समाज साधारण
- नाइ माथ = मस्तक झुकाकर
- रघुनाथ पद = श्रीरघुनाथजी के चरण
- जानब = जानना चाहिए
- मध्यम काज = कार्य भी मध्यम
मध्यम दिन मध्यम दसा, मध्यम सकल समाज = दिन साधारण, दशा साधारण और सारा समाज भी साधारण है। जानब मध्यम काज = कार्य भी मध्यम ही जानना।
भावार्थ / व्याख्या:
जब दिन साधारण हो, दशा साधारण हो और सारा वातावरण भी साधारण हो, तब श्रीरघुनाथजी के चरणों में मस्तक झुकाकर कार्य को भी मध्यम अर्थात् साधारण ही समझना चाहिए।
यह रामाज्ञा प्रश्न का सबसे संतुलित और ईमानदार दोहा है। यह न शुभ कहता है, न अशुभ — बल्कि स्पष्ट रूप से ‘मध्यम’ कहता है।
शकुन की दृष्टि से इसका अर्थ है — परिणाम न बहुत अच्छा होगा, न बहुत बुरा। जो अपेक्षा है उसका आधा-अधूरा फल मिलेगा। इसलिए न अति उत्साहित हों, न निराश। यह उन प्रश्नों के लिए उपयुक्त उत्तर है जहाँ स्थिति स्पष्ट रूप से किसी एक ओर न हो।
शकुन फल:
यह शकुन मध्यम फल का सूचक है — न बहुत अच्छा, न बहुत बुरा। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- ऐसा कार्य जिसमें अपेक्षा बहुत अधिक हो
- सामान्य दिनचर्या और साधारण निर्णय
- किसी सौदे या प्रस्ताव का औसत परिणाम
- जहाँ स्थिति स्पष्ट रूप से किसी ओर न हो
- धैर्य और संतुलन की आवश्यकता वाली स्थिति
इस दोहे के आने पर परिणाम मध्यम रहेगा। अपेक्षा संतुलित रखें — न बहुत आशा, न निराशा। रघुनाथजी के चरणों में सिर झुकाकर सहज भाव से आगे बढ़ें।
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