रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 2 श्लोक 4 — सूर्य-ग्रहण का समय राजा-प्रजा दोनों को क्लेशकारी; विकट संकट और कलह का सूचक शकुन।
सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। प्रस्तुत दोहा सप्तम सर्ग के दूसरे सप्तक में चौथा स्थान पर है, जहाँ प्रश्न पूछने की सही रीति समझाई गई है।
सूर्य-ग्रहण का समय — राजा और प्रजा दोनों को क्लेश।
मूल दोहा: समउ राहु रवि गहनु मत, राजहिं प्रजहिं कलेस। सगुन सोच संकट बिकट, कलह कलुष दुख देस॥४॥
शब्दार्थ:
- समउ = समय
- राहु रवि गहनु = राहु द्वारा सूर्य का ग्रहण
- मत = माना गया
- राजहिं = राजा को
- प्रजहिं = प्रजा को
- कलेस = क्लेश
- सोच = चिंता
- संकट बिकट = विकट संकट
- कलह कलुष = झगड़ा और पाप
- दुख देस = देश में दुःख
समउ राहु रवि गहनु मत, राजहिं प्रजहिं कलेस = सूर्य-ग्रहण का समय राजा और प्रजा दोनों को क्लेश देता है। कलह कलुष दुख देस = झगड़ा, पाप और देश में दुःख।
भावार्थ / व्याख्या:
जब राहु सूर्य को ग्रस लेता है, अर्थात् सूर्य-ग्रहण का समय हो, तब वह राजा और प्रजा दोनों के लिए क्लेशकारी माना गया है।
इस समय का शकुन चिंता, विकट संकट, कलह, पाप तथा देश में व्यापक दुःख का सूचक है।
सूर्य राजा और अधिकार का कारक है। जब उस पर ग्रहण लगे, तो नेतृत्व कमज़ोर पड़ता है और व्यवस्था डगमगाती है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में गंभीर चेतावनी देता है जहाँ शासन, नेतृत्व या सामूहिक व्यवस्था विषय हो। ग्रहण-काल में कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए — यह परंपरा इसी सिद्धांत पर आधारित है।
शकुन फल:
यह शकुन विकट संकट और क्लेश का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सतर्कता:
- नेतृत्व, शासन या अधिकार पर संकट
- संस्था या समूह की व्यवस्था डगमगाना
- व्यापक स्तर पर फैलने वाला कलह
- ग्रहण-काल में किया जाने वाला कार्य
- पिता, अधिकारी या वरिष्ठ से जुड़ा प्रश्न
इस दोहे के आने पर विकट संकट का संकेत है। कोई शुभ कार्य इस समय आरंभ न करें, विवाद से दूर रहें और स्थिति सामान्य होने की प्रतीक्षा करें।
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