रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 2 श्लोक 5 — चंद्र-ग्रहण अथाह समुद्र समान अपशकुन; ईति-भीति और साधुओं के कष्ट का सूचक।
जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। प्रस्तुत दोहा सप्तम सर्ग के दूसरे सप्तक में पाँचवाँ स्थान पर है, जहाँ प्रश्न पूछने की सही रीति समझाई गई है।
चंद्र-ग्रहण का समय — अथाह समुद्र के समान अपशकुन।
मूल दोहा: राहु सोम संगमु बिषमु, असगुन उदधि अगाधु। ईति भीति खल दल प्रबल, सीदहिं भूसुर साधु॥५॥
शब्दार्थ:
- राहु सोम संगमु = राहु और चन्द्रमा का संगम (चंद्र-ग्रहण)
- बिषमु = विषम, कठिन
- असगुन = अपशकुन
- उदधि अगाधु = अथाह समुद्र
- ईति = प्राकृतिक उपद्रव
- भीति = भय
- खल दल = दुष्टों का दल
- प्रबल = प्रबल
- सीदहिं = दुःखी होंगे
- भूसुर साधु = ब्राह्मण और साधु
राहु सोम संगमु बिषमु, असगुन उदधि अगाधु = चंद्र-ग्रहण विषम है, यह अपशकुन अथाह समुद्र के समान है। सीदहिं भूसुर साधु = ब्राह्मण और साधु दुःखी होंगे।
भावार्थ / व्याख्या:
राहु और चन्द्रमा का संगम अर्थात् चंद्र-ग्रहण अत्यंत विषम है और यह अपशकुन अथाह समुद्र के समान गहरा है।
इस समय ईति अर्थात् प्राकृतिक उपद्रव, भय तथा दुष्टों का दल प्रबल हो जाता है और ब्राह्मण तथा साधु-सज्जन दुःखी होते हैं।
चन्द्रमा मन का कारक है। जब उस पर ग्रहण लगे, तो मानसिक अशांति, भ्रम और भय बढ़ता है। ‘उदधि अगाधु’ का रूपक बताता है कि यह अपशकुन सतही नहीं, गहरा है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में चेतावनी देता है जहाँ मानसिक शांति, प्राकृतिक आपदा या सज्जनों की स्थिति विषय हो।
शकुन फल:
यह अपशकुन अथाह समुद्र के समान गहरा है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सतर्कता:
- मानसिक अशांति, भय या तनाव
- प्राकृतिक आपदा या ईति-भीति
- दुष्टों या असामाजिक तत्वों का प्रभाव
- सज्जनों और सत्पुरुषों की कठिनाई
- चंद्र-ग्रहण काल में किया जाने वाला कार्य
इस दोहे के आने पर गहरा अपशकुन है। मन को शांत रखें, कोई निर्णय न लें और सज्जनों का संग बनाए रखें। यह समय बीत जाएगा।
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