रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 7 श्लोक 2 — सीता-त्याग के बाद श्रीराम का पश्चात्ताप और खिन्न मन; यह प्रश्न-फल निकृष्ट है।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। षष्ठम सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें दूसरा दोहा — इस सर्ग के शकुन निर्मल विचार और सत्य आचरण का फल बताते हैं।
प्रभु का पश्चात्ताप — यह प्रश्न-फल निकृष्ट है।
मूल दोहा: मानिय सिय अपराध बिनु प्रभु परिहरि पछितात। रुचै समाज न राज सुख, मन मलीन कृस गात॥२॥
शब्दार्थ:
- मानिय = मानना चाहिए
- अपराध बिनु = बिना किसी अपराध के
- परिहरि = त्याग करके
- पछितात = पश्चात्ताप करते हैं
- रुचै = अच्छा नहीं लगता
- राज सुख = राज्य का सुख
- मन मलीन = चित्त खिन्न
- कृस गात = दुर्बल शरीर
मानिय सिय अपराध बिनु प्रभु परिहरि पछितात = बिना अपराध के सीताजी का त्याग करके प्रभु पश्चात्ताप कर रहे हैं। मन मलीन कृस गात = चित्त खिन्न और शरीर दुर्बल है।
भावार्थ / व्याख्या:
ऐसा मानना चाहिए कि बिना किसी अपराध के श्रीजानकीजी का त्याग करके प्रभु पश्चात्ताप कर रहे हैं। उन्हें समाज में रहना तथा राज्य का सुख अच्छा नहीं लगता, चित्त खिन्न रहता है और शरीर दुर्बल हो गया है।
यह श्रीराम का सबसे मानवीय चित्र है। राजा होते हुए भी वे भीतर से टूटे हुए हैं और राज्य का वैभव उन्हें सुख नहीं दे पा रहा।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘निकृष्ट’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में चेतावनी देता है जहाँ किसी निर्णय के बाद पछतावा हो रहा हो, या जहाँ बाहरी सफलता के बावजूद भीतर से मन दुःखी हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल निकृष्ट है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- किसी लिए गए निर्णय पर पछतावा
- बाहरी सफलता के बावजूद भीतरी असंतोष
- मानसिक तनाव और शारीरिक दुर्बलता
- संबंध टूटने के बाद की स्थिति
- सुख-साधन होते हुए भी मन का न लगना
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल निकृष्ट है। यदि किसी निर्णय पर पछतावा है तो उसे सुधारने का मार्ग खोजें। अपने स्वास्थ्य और मन का भी ध्यान रखें।
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