रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 5 — लोकमत के लिए सीता-त्याग और श्रीराम का दुःसह दुःख; प्रियजन-वियोग का सूचक शकुन।
जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। इस छठे सप्तक के पाँचवाँ दोहे में षष्ठम सर्ग का वह भाव है जहाँ हर्ष के साथ-साथ वियोग की छाया भी दिखाई देती है।
सीता-त्याग और दुःसह दुःख — परिणाम में प्रियजन का वियोग।
मूल दोहा: सती सिरोमनी सीय तजि, राखि लोग रुचि राम। सहे दुसह दुख सगुन गत प्रिय बियोगु परिनाम॥५॥
शब्दार्थ:
- सती सिरोमनी = सतियों में शिरोमणि
- तजि = त्याग करके
- राखि लोग रुचि = लोगों की रुचि रखी
- सहे = सहा
- दुसह दुख = असहनीय दुःख
- सगुन गत = इस शकुन का
- प्रिय बियोगु = प्रियजन का वियोग
- परिनाम = परिणाम में
सती सिरोमनी सीय तजि, राखि लोग रुचि राम = सती-शिरोमणि सीताजी का त्याग कर श्रीराम ने लोगों की रुचि रखी। प्रिय बियोगु परिनाम = परिणाम में प्रियजन का वियोग है।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम ने सती-शिरोमणि श्रीजानकीजी का त्याग करके लोगों की रुचि रखी और स्वयं असहनीय दुःख सहा।
यह रामकथा का सबसे विवादित और सबसे दुःखद निर्णय है। एक राजा के रूप में उन्होंने लोकमत का सम्मान किया, परंतु एक पति के रूप में वे आजीवन दुःखी रहे।
तुलसीदास जी कहते हैं कि इस अपशकुन का फल परिणाम में प्रियजन का वियोग है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में चेतावनी देता है जहाँ सामाजिक दबाव में कोई ऐसा निर्णय लिया जा रहा हो जिससे किसी अपने से दूरी बन जाए।
शकुन फल:
इस शकुन का फल प्रियजन का वियोग है। निम्नलिखित प्रश्नों में सावधानी:
- सामाजिक दबाव में लिया जा रहा निर्णय
- किसी अपने से दूरी बनने की स्थिति
- कर्तव्य और संबंध के बीच का द्वंद्व
- लोगों की बात मानकर किया जा रहा त्याग
- संबंध टूटने या बिछड़ने की आशंका
इस दोहे के आने पर प्रियजन के वियोग की आशंका है। सामाजिक दबाव में ऐसा निर्णय न लें जिसका पछतावा जीवन भर रहे। दोनों पक्षों पर ठंडे मन से विचार करें।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।