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रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 2

रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 2 — भरतजी का चारु आचरण; स्वामी-चयन, धर्म, व्रत और नियम-पालन को सफल करने वाला शकुन।

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॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। यह दोहा षष्ठम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से दूसरा है — यहाँ प्रेम, धर्म और मर्यादा के भाव प्रमुख हैं।

भरतजी का आचरण — स्वामी चुनने, धर्म, व्रत और नियम में सफलता।

मूल दोहा: सगुन समय सुमिरत सुखद, भरत आचरनु चारु। स्वामि धरम ब्रत पेम हित, नेम निबाहनिहारु॥२॥

शब्दार्थ:

  • सुमिरत सुखद = स्मरण करने से सुखदायी
  • आचरनु चारु = सुंदर आचरण
  • स्वामि धरम = आराध्य या स्वामी चुनना
  • ब्रत = व्रत
  • पेम = प्रेम, भक्ति
  • नेम = नियम
  • निबाहनिहारु = निभाने वाला

सगुन समय सुमिरत सुखद, भरत आचरनु चारु = भरतजी का सुंदर आचरण स्मरण करने से सुखदायी है। नेम निबाहनिहारु = नियम-पालन को सफल करने वाला।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीभरतजी का सुंदर आचरण स्मरण करने से सुख देने वाला है। तुलसीदास जी कहते हैं कि इस समय का यह शकुन स्वामी अर्थात् आराध्य चुनने, धर्माचरण, व्रत, प्रेम तथा नियम-पालन को सफल करने वाला समझो।

भरतजी ने चौदह वर्ष तक श्रीराम की पादुका के प्रति निष्ठा निभाई। यह नियम-पालन का सर्वोच्च उदाहरण है।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ किसी दीर्घकालिक संकल्प, व्रत या निष्ठा का प्रश्न हो। यह आश्वासन देता है कि जो नियम आपने लिया है, आप उसे निभा पाएँगे।

शकुन फल:

यह शकुन नियम-पालन और निष्ठा को सफल करने वाला है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • व्रत, संकल्प या दीर्घकालिक नियम
  • गुरु, आराध्य या स्वामी का चयन
  • धर्माचरण और नैतिक मार्ग
  • किसी के प्रति निष्ठा निभाने की परीक्षा
  • भक्ति और प्रेम से जुड़ा प्रश्न

इस दोहे के आने पर आपका नियम और संकल्प सफल होगा। जो निष्ठा निभा रहे हैं, वह अवश्य फल देगी।

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