रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 1 श्लोक 3 — सीताजी के शपथ-प्रसंग में अग्नि का शीतल होना; नियम, प्रेम, व्रत और धर्म का उत्तम शकुन।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। यह पहले सप्तक का तीसरा दोहा है। षष्ठम सर्ग विजय के पश्चात अयोध्या-वापसी और राज्याभिषेक के प्रसंगों का सर्ग है।
अग्नि का शीतल होना — नियम, प्रेम, व्रत और धर्म के लिए उत्तम।
मूल दोहा: सीता सपथ प्रसंग सुभ सीतल भयउ कृसानु। नेम प्रेम ब्रत धरम हित सगुन सुहावनु जानु॥३॥
शब्दार्थ:
- सपथ प्रसंग = शपथ-ग्रहण का प्रसंग
- सीतल भयउ = शीतल हो गया
- कृसानु = अग्नि
- नेम = नियम
- प्रेम = भक्ति, प्रेम
- ब्रत = व्रत
- धरम = धर्माचरण
- सुहावनु = उत्तम, सुंदर
सीता सपथ प्रसंग सुभ, सीतल भयउ कृसानु = सीताजी के शपथ-प्रसंग में अग्नि शीतल हो गया। नेम प्रेम ब्रत धरम हित = नियम, प्रेम, व्रत और धर्म के लिए यह शकुन उत्तम है।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीजानकीजी के शपथ-ग्रहण का प्रसंग शुभ है — उनके लिए अग्नि शीतल हो गया था। जो अग्नि सब कुछ जला देती है, वह पवित्रता के सामने शीतल हो गई।
तुलसीदास जी कहते हैं कि नियम-पालन, प्रेम, व्रत एवं धर्माचरण के लिए यह शकुन उत्तम समझो।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ किसी की सत्यता या शुद्धता की परीक्षा हो, या जहाँ व्रत और धर्म-पालन विषय हो। संदेश स्पष्ट है — जो सत्य पर है, उसे कोई अग्नि नहीं जला सकती।
शकुन फल:
यह शकुन नियम, प्रेम, व्रत और धर्म के लिए उत्तम है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- अपनी सत्यता या निर्दोषिता सिद्ध करना
- व्रत, नियम या संकल्प का पालन
- किसी परीक्षा या जाँच से गुज़रना
- झूठे आरोप या कलंक से मुक्ति
- धर्म और सत्य के मार्ग पर दृढ़ता
इस दोहे के आने पर शकुन उत्तम है। जो सत्य पर है उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। अपनी निर्दोषिता सिद्ध होगी।
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