रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 7 श्लोक 7 — विभीषण का लंका में राज्याभिषेक; पंचम सर्ग का अंतिम दोहा, विजय-मंगल-कुशल का सूचक।
प्रश्न पूछने की परंपरा में मन को एकाग्र कर, श्रीराम का स्मरण करते हुए सर्ग, सप्तक और दोहा — तीनों संख्याएँ चुनी जाती हैं। पंचम सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें सातवाँ दोहा — इस सर्ग के शकुन प्रायः उद्यम और पुरुषार्थ की ओर संकेत करते हैं।
यह पंचम सर्ग का अंतिम, उनचासवाँ दोहा है — विजय, मंगल और कुशल का सूचक।
मूल दोहा: लंका थापि बिभीषनहि बिबुध बसाइ सुबास। तुलसी जय मंगल कुसल, सुभ पंचम उनचास॥७॥
शब्दार्थ:
- लंका थापि = लंका में स्थापित किया
- बिभीषनहि = विभीषण को
- बिबुध = देवता
- बसाइ = बसाकर
- सुबास = भली प्रकार, निर्भय
- जय = विजय
- मंगल = मंगल
- कुसल = कुशल
- पंचम उनचास = पंचम सर्ग का उनचासवाँ दोहा
लंका थापि बिभीषनहि = लंका में विभीषण को स्थापित किया। तुलसी जय मंगल कुसल, सुभ पंचम उनचास = यह उनचासवाँ दोहा विजय, मंगल और कुशल का सूचक है।
भावार्थ / व्याख्या:
प्रभु ने लंका में विभीषण को राज्य देकर स्थापित किया और देवताओं को भली प्रकार निर्भय करके बसाया। तुलसीदास जी कहते हैं कि पंचम सर्ग का यह उनचासवाँ दोहा शुभ है और विजय, मंगल तथा कुशल का सूचक है।
यहाँ ध्यान देने योग्य है कि श्रीराम ने लंका जीतकर अपने पास नहीं रखी — विभीषण को दे दी। यही उनकी विजय को महान बनाता है।
पंचम सर्ग रामाज्ञा प्रश्न का सबसे उतार-चढ़ाव वाला सर्ग है — इसमें समुद्र-लंघन का उत्साह भी है, लंका-दहन का विनाश भी, उल्कापात के भयंकर अपशकुन भी और अंतिम विजय भी। और उसका समापन इस पूर्ण मंगल पर होता है।
शकुन फल:
यह शकुन विजय, मंगल और कुशल का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- लंबे संघर्ष के बाद मिलने वाली विजय
- किसी को उसका अधिकार या पद सौंपना
- विजय के बाद व्यवस्था और पुनर्निर्माण
- सुरक्षा, कुशलता और शांति की स्थापना
- किसी बड़े कार्य का सफल समापन
इस दोहे के आने पर विजय, मंगल और कुशल तीनों का संकेत है। संघर्ष समाप्त हुआ — अब स्थिरता और व्यवस्था का समय है।
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