रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 7 — सिर पर समर्थ स्वामी होने से निर्भय लड़ते वानर-भालू; शत्रु पर विजय सूचित करने वाला शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ पढ़ते समय दोहे का अर्थ और उसका शकुन-फल — दोनों को साथ रखकर विचार करना उचित माना गया है। इस छठे सप्तक के सातवाँ दोहे में पंचम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रयत्न मत छोड़ो, मार्ग निकल आएगा।
सिर पर समर्थ स्वामी — शकुन शत्रु पर विजय सूचित करता है।
मूल दोहा: लरत भालु कपि सुभट सब निदरि निसाचर घोर। सिर पर समरथ राम सो साहिब तुलसी तोर॥७॥
शब्दार्थ:
- लरत = युद्ध करते हैं
- भालु कपि = भालू और वानर
- सुभट = श्रेष्ठ योद्धा
- निदरि = उपेक्षा करके
- निसाचर घोर = घोर राक्षस
- सिर पर = सिर पर, ऊपर
- समरथ = सर्वसमर्थ
- साहिब = स्वामी
- तोर = तुम्हारे
लरत भालु कपि सुभट सब निदरि निसाचर घोर = वानर-भालू घोर राक्षसों की उपेक्षा करके युद्ध कर रहे हैं। सिर पर समरथ राम सो साहिब = क्योंकि श्रीराम जैसे समर्थ स्वामी उनके सिर पर हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
वानर-भालुओं के सभी श्रेष्ठ योद्धा घोर राक्षसों की उपेक्षा करके निर्भय होकर युद्ध कर रहे हैं, क्योंकि श्रीराम जैसे सर्वसमर्थ प्रभु उनके रक्षक हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि वे ही तुम्हारे भी स्वामी हैं।
यहाँ शक्ति का स्रोत स्पष्ट है — वानर स्वयं बलशाली नहीं थे, परंतु उनके सिर पर समर्थ स्वामी का हाथ था।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन शत्रु पर विजय सूचित करता है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ प्रश्नकर्ता स्वयं को कमज़ोर समझ रहा हो पर उसका पक्ष सही हो।
शकुन फल:
यह शकुन शत्रु पर विजय सूचित करता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- किसी बलशाली शत्रु या विरोधी से संघर्ष
- स्वयं को कमज़ोर समझते हुए किया जा रहा मुकाबला
- मुकदमा, प्रतियोगिता या विवाद
- किसी बड़े के संरक्षण में किया जा रहा कार्य
- न्याय और सत्य के पक्ष में खड़ा होना
इस दोहे के आने पर शत्रु पर विजय का संकेत है। अपनी शक्ति कम मत आँकें — जब पक्ष सही हो, तब समर्थ स्वामी का हाथ सिर पर होता है।
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