रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 4 — वानर-भालुओं द्वारा सागर-सेतु निर्माण और समुद्र-पार गमन; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।
सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। इस छठे सप्तक के चौथा दोहे में पंचम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रयत्न मत छोड़ो, मार्ग निकल आएगा।
सेतु-निर्माण और समुद्र पार — प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: राम कृपाँ कपि भालु करि कौतुक सागर सेतु। चले पार बरसत बिबुध सुमन सुमंगल हेतु॥४॥
शब्दार्थ:
- राम कृपाँ = श्रीराम की कृपा से
- कपि भालु = वानर-भालू
- करि कौतुक = खेल-खेल में
- सागर सेतु = समुद्र पर सेतु
- चले पार = पार चले
- बरसत = वर्षा करते हैं
- बिबुध = देवता
- सुमन = पुष्प
- सुमंगल हेतु = मंगल के लिए
राम कृपाँ कपि भालु करि कौतुक सागर सेतु = श्रीराम की कृपा से वानर-भालुओं ने खेल-खेल में समुद्र पर सेतु बनाया। चले पार बरसत बिबुध सुमन = पार चले, देवता पुष्प-वर्षा करते हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम की कृपा से खेल-ही-खेल में समुद्र पर सेतु बनाकर वानर-भालू समुद्र पार चले और उनके मंगल के लिए देवता पुष्प-वर्षा कर रहे हैं।
सेतुबंध रामायण की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि है। जो कार्य असंभव लगता था — समुद्र पर पुल बनाना — वह सामूहिक प्रयास और श्रद्धा से संभव हुआ।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में सर्वाधिक अनुकूल है जहाँ कोई बड़ी बाधा पार करनी हो या कोई बड़ी परियोजना पूरी करनी हो। सामूहिक प्रयास इस समय अत्यंत फलदायी रहेगा।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:
- बड़ी बाधा पार करना या असंभव कार्य
- निर्माण, पुल, भवन या बड़ी परियोजना
- सामूहिक प्रयास से किया जाने वाला कार्य
- समुद्र, नदी या विदेश की यात्रा
- टीम वर्क से मिलने वाली सफलता
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। जो बाधा असंभव लग रही है वह पार होगी। अकेले न जूझें — सामूहिक प्रयास करें।
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