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रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 5 श्लोक 5 — मुनि के माँगने पर दशरथजी द्वारा राम-लक्ष्मण को सौंपना; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।

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तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। चतुर्थ सर्ग के पाँचवें सप्तक का पाँचवाँ दोहा प्रस्तुत है, जिसमें उत्सव, विवाह और मंगल-कार्य के शकुन देखे जाते हैं।

दशरथजी द्वारा पुत्रों को सौंपना — प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।

मूल दोहा: मुनि माँग दसरथ दिए रामु लखनु दोउ भाइ। पाइ सगुन फल सुकृत फल प्रमुदित चले लेवाइ॥५॥

शब्दार्थ:

  • मुनि माँग = मुनि के माँगने पर
  • दिए = दे दिए, सौंप दिए
  • दोउ भाइ = दोनों भाई
  • पाइ = पाकर
  • सगुन फल = शकुनों का फल
  • सुकृत फल = पुण्यों का फल
  • प्रमुदित = अत्यंत प्रसन्न
  • चले लेवाइ = साथ ले चले

मुनि माँग दसरथ दिए रामु लखनु दोउ भाइ = मुनि के माँगने पर दशरथजी ने राम-लक्ष्मण सौंप दिए। पाइ सगुन फल सुकृत फल = शकुनों और पुण्यों का फल पाकर।

भावार्थ / व्याख्या:

मुनि के माँगने पर महाराज दशरथ ने उन्हें श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को सौंप दिया। पहले हुए शकुनों का फल तथा अपने पुण्यों का फल पाकर अत्यंत प्रसन्न होकर मुनि दोनों भाइयों को साथ ले चले।

यह दशरथजी के लिए अत्यंत कठिन निर्णय था। पुत्रों को राक्षसों से भरे वन में भेजना कोई सरल बात नहीं थी। परंतु उन्होंने गुरु वसिष्ठजी की सलाह मानकर यह त्याग किया।

तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में अनुकूल है जहाँ कोई प्रिय वस्तु या व्यक्ति सौंपना, या कठिन त्याग करना विषय हो। संदेश यह है कि यह त्याग व्यर्थ नहीं जाएगा।

शकुन फल:

यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:

  • संतान को शिक्षा या प्रशिक्षण हेतु भेजना
  • किसी प्रिय वस्तु या व्यक्ति को सौंपना
  • कठिन त्याग या बड़ा निर्णय लेना
  • किसी योग्य व्यक्ति के संरक्षण में देना
  • माँगी गई सहायता या अनुरोध स्वीकार करना

इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। जो त्याग या समर्पण करना पड़ रहा है, वह व्यर्थ नहीं जाएगा — उसका फल बहुत बड़ा होगा।

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