रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 5 श्लोक 4 — दशरथजी का षोडशोपचार पूजन और विनम्रता देखकर मुनि का अभीष्ट आशीर्वाद; उत्तम प्रश्न-फल।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। चतुर्थ सर्ग के पाँचवें सप्तक का चौथा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें उत्सव, विवाह और मंगल-कार्य के शकुन देखे जाते हैं।
षोडशोपचार पूजन और मुनि का आशीर्वाद — प्रश्न-फल उत्तम है।
मूल दोहा: सादर सोरह भाँति नृप पूजि पहुनई कीन्हि। बिनय बड़ाई देखि मुनि अभिमत आसिष दीन्हि॥४॥
शब्दार्थ:
- सादर = आदरपूर्वक
- सोरह भाँति = सोलह प्रकार से, षोडशोपचार
- नृप = महाराज
- पूजि = पूजन करके
- पहुनई = आतिथ्य सत्कार
- बिनय = विनम्रता
- बड़ाई = सम्मान
- अभिमत = अभीष्ट, मनचाहा
- आसिष = आशीर्वाद
सादर सोरह भाँति नृप पूजि पहुनई कीन्हि = आदरपूर्वक षोडशोपचार से पूजन कर आतिथ्य किया। बिनय बड़ाई देखि मुनि अभिमत आसिष दीन्हि = विनम्रता देखकर मुनि ने अभीष्ट आशीर्वाद दिया।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज दशरथ ने आदरपूर्वक षोडशोपचार से विश्वामित्रजी का पूजन करके आतिथ्य सत्कार किया। महाराज का विनम्र भाव तथा सम्मान देखकर मुनि विश्वामित्रजी ने अभीष्ट आशीर्वाद दिया।
ध्यान देने योग्य है कि आशीर्वाद पूजन-सामग्री देखकर नहीं, बल्कि ‘बिनय बड़ाई’ अर्थात् विनम्रता और सम्मान देखकर मिला।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘उत्तम’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ किसी से अभीष्ट फल या स्वीकृति चाहिए हो। संदेश स्पष्ट है — विनम्रता ही सबसे बड़ी शक्ति है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल उत्तम है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- किसी से अभीष्ट फल या स्वीकृति की आशा
- अतिथि सत्कार या किसी का सम्मान
- गुरु, वरिष्ठ या अधिकारी से आशीर्वाद
- विनम्रता से सुलझने वाला कोई मामला
- पूजन, अनुष्ठान या विधिवत सत्कार
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल उत्तम है। विनम्रता और सम्मान से काम लें — अभीष्ट आशीर्वाद और मनचाहा फल मिलेगा।
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