रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 5 श्लोक 3 — विश्वामित्रजी का मंगल शकुनों सहित अयोध्या आगमन और दशरथजी का आदर; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। चतुर्थ सर्ग के पाँचवें सप्तक का तीसरा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें उत्सव, विवाह और मंगल-कार्य के शकुन देखे जाते हैं।
विश्वामित्रजी का अयोध्या आगमन — प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: चले मुदित कौसिक अवध सगुन सुमंगल साथ। आए सुनि सनमानि गृहँ आने कोसलनाथ॥३॥
शब्दार्थ:
- चले मुदित = प्रसन्न होकर चले
- कौसिक = विश्वामित्रजी
- अवध = अयोध्या
- सगुन सुमंगल साथ = मंगलदायक शकुन साथ-साथ
- सुनि = सुनकर
- सनमानि = आदरपूर्वक
- गृहँ आने = भवन में ले आए
- कोसलनाथ = महाराज दशरथ
चले मुदित कौसिक अवध = विश्वामित्रजी प्रसन्न होकर अयोध्या चले। सगुन सुमंगल साथ = मंगलदायक शकुन साथ-साथ चल रहे थे।
भावार्थ / व्याख्या:
महर्षि विश्वामित्र प्रसन्न होकर अयोध्या चले और श्रेष्ठ मंगलदायक शकुन उनके साथ-साथ चल रहे थे। महाराज दशरथ उनका आगमन सुनकर आगे जाकर आदरपूर्वक उन्हें राजभवन में ले आए।
‘सगुन सुमंगल साथ’ अत्यंत सुंदर पद है — शकुन मानो उनके सहयात्री बन गए हों। जब उद्देश्य शुभ हो तो मार्ग स्वयं शुभ हो जाता है।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ किसी से मिलने जाना, अतिथि का आगमन या किसी बड़े का स्वागत विषय हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:
- किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का आगमन या स्वागत
- किसी से मिलने या अनुरोध करने जाना
- यात्रा जिसका उद्देश्य शुभ हो
- अतिथि सत्कार और आतिथ्य
- किसी बड़े से सहायता माँगने का अवसर
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। मंगल शकुन आपके साथ-साथ चलेंगे। जिससे मिलने जा रहे हैं, वहाँ आदर मिलेगा।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।