रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 4 श्लोक 1 — नारदजी से राम-कथा सुनकर हनुमानजी के मन में प्रेम की उमंग; प्रियजन का संवाद मिलने का शकुन।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। यह दोहा चतुर्थ सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से पहला है — यहाँ गुरु का आशीर्वाद और कुल की वृद्धि प्रमुख भाव हैं।
नारदजी का राम-कथा वर्णन और हनुमानजी का प्रेम — प्रियजन का संवाद मिलेगा।
मूल दोहा: राम जनक सुभ काज सब कहत देवरिषि आइ। सुनि सुनि मन हनुमान के प्रेम उमँग न अमाइ॥१॥
शब्दार्थ:
- देवरिषि = देवर्षि नारदजी
- कहत = वर्णन करते हैं
- आइ = आकर
- सुनि सुनि = बार-बार सुनकर
- प्रेम उमँग = प्रेम की उमंग
- न अमाइ = समाती नहीं
राम जनक सुभ काज सब कहत देवरिषि आइ = देवर्षि नारद आकर श्रीराम-अवतार के शुभ कार्यों का वर्णन करते हैं। प्रेम उमँग न अमाइ = प्रेम की उमंग समाती नहीं।
भावार्थ / व्याख्या:
देवर्षि नारदजी आकर श्रीराम के अवतार से होने वाले सभी शुभ कार्यों का वर्णन करते हैं। उनकी चर्चा बार-बार किष्किंधा में सुनकर हनुमानजी के मन में प्रेम की उमंग समाती नहीं।
यह प्रसंग बताता है कि हनुमानजी श्रीराम से मिलने से बहुत पहले ही उनके प्रेम में डूब चुके थे — केवल कथा सुनकर।
तुलसीदास जी इसका शकुन-फल बताते हैं — प्रियजन का संवाद मिलेगा। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में अनुकूल है जहाँ किसी दूर बैठे प्रियजन का समाचार या संदेश प्रतीक्षित हो।
शकुन फल:
यह शकुन प्रियजन का संवाद मिलने का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- दूर बैठे प्रियजन का समाचार या संदेश
- किसी की खबर या सूचना की प्रतीक्षा
- बिना मिले ही किसी के प्रति लगाव
- कथा, सत्संग या प्रवचन से मिलने वाला आनंद
- भविष्य में होने वाली महत्वपूर्ण भेंट की भूमिका
इस दोहे के आने पर प्रियजन का संवाद मिलेगा। जिस समाचार की प्रतीक्षा है वह आएगा और मन प्रसन्न होगा।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।