रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 1 श्लोक 2 — कुलगुरु की कृपा से पुत्रेष्टि यज्ञ और रानियों में चरु का वितरण; शुभ प्रश्न-फल।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। यह पहले सप्तक का दूसरा दोहा है। चतुर्थ सर्ग श्रीराम-जन्म से लेकर चारों भाइयों के विवाह तक के मंगलमय प्रसंगों का सर्ग है।
पुत्रेष्टि यज्ञ और चरु का वितरण — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: दसरथ कुल गुरु की कृपाँ सुत हित जाग कराइ। पायस पाइ बिभाग करि रानिन्ह दीन्ह बुलाइ॥२॥
शब्दार्थ:
- कुल गुरु = कुलगुरु वसिष्ठजी
- कृपाँ = कृपा से
- सुत हित = पुत्र के लिए
- जाग = यज्ञ
- कराइ = कराकर
- पायस = खीर, चरु
- बिभाग करि = बाँटकर
- रानिन्ह = रानियों को
- दीन्ह बुलाइ = बुलाकर दिया
सुत हित जाग कराइ = पुत्र के लिए यज्ञ कराकर। पायस पाइ बिभाग करि = खीर पाकर उसका विभाग करके दिया।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज दशरथ ने कुलगुरु वसिष्ठजी की कृपा से पुत्रेष्टि यज्ञ कराया और प्रसाद रूप में मिली खीर को रानियों को बुलाकर, बाँटकर दे दिया।
इस दोहे में क्रम महत्वपूर्ण है — पहले गुरु की कृपा, फिर विधिवत यज्ञ, फिर प्रसाद, और फिर उसका न्यायपूर्ण वितरण। दशरथजी ने प्रसाद अकेले नहीं रखा, सब रानियों में बाँटा।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है। यह उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ अनुष्ठान, यज्ञ या किसी धार्मिक प्रयत्न का फल विषय हो। साथ ही यह बताता है कि जो लाभ मिले, उसे बाँटने से वह और बढ़ता है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- यज्ञ, हवन या अनुष्ठान का फल
- संतान प्राप्ति हेतु किया जा रहा उपाय
- गुरु या पुरोहित के मार्गदर्शन में किया गया कार्य
- किसी लाभ या संपत्ति का न्यायपूर्ण बँटवारा
- औषधि, उपचार या चिकित्सा का प्रभाव
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। अनुष्ठान या उपाय का फल मिलेगा। जो लाभ मिले, उसे बाँटने में संकोच न करें — इससे वह और बढ़ेगा।
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