रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 1 श्लोक 3 — गर्भवती रानियों की शोभा और अवर्णनीय तेज; यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। यह पहले सप्तक का तीसरा दोहा है। चतुर्थ सर्ग श्रीराम-जन्म से लेकर चारों भाइयों के विवाह तक के मंगलमय प्रसंगों का सर्ग है।
रानियों का गर्भवती होना — यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: सब सगरभ सोहहिं सदन सकल सुमंगल खानि। तेज प्रताप प्रसन्नता रूप न जाहिं बखानि॥३॥
शब्दार्थ:
- सगरभ = गर्भवती
- सोहहिं = सुशोभित होती हैं
- सदन = भवन, महल
- सुमंगल खानि = मंगलों की खान
- तेज = तेज
- प्रताप = प्रताप
- प्रसन्नता = प्रसन्नता
- न जाहिं बखानि = वर्णन नहीं किया जा सकता
सब सगरभ सोहहिं सदन = सब रानियाँ गर्भवती होकर महल में सुशोभित हैं। रूप न जाहिं बखानि = उनके सौंदर्य का वर्णन नहीं किया जा सकता।
भावार्थ / व्याख्या:
सब रानियाँ गर्भवती होकर अयोध्या के राजमहल में सुशोभित हो रही हैं। वे समस्त शुभ मंगलों की खान हैं। उनके तेज, प्रताप, आनंद और सौंदर्य का वर्णन नहीं किया जा सकता।
यह प्रतीक्षा और आशा का सबसे सुंदर काल है — जब फल अभी मिला नहीं, पर उसका निश्चय हो चुका है।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ कोई कार्य आरंभ हो चुका है और उसका फल आने वाला है। यह आश्वासन देता है कि जो बीज पड़ चुका है, वह अवश्य फलीभूत होगा।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:
- गर्भावस्था और मातृत्व से जुड़ा प्रश्न
- आरंभ हो चुके कार्य का फल
- स्त्रियों के स्वास्थ्य और कल्याण का प्रश्न
- घर में सुख, समृद्धि और तेज
- प्रतीक्षा की अवधि में धैर्य से जुड़ा प्रश्न
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। जो कार्य आरंभ हो चुका है वह अवश्य फलीभूत होगा। प्रतीक्षा का यह समय भी मंगलमय रहेगा।
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