रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 1 श्लोक 4 — रानियों का सुहावना स्वप्न और महाराज से उसका वर्णन; शुभ प्रश्न-फल।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। यह पहले सप्तक का चौथा दोहा है। चतुर्थ सर्ग श्रीराम-जन्म से लेकर चारों भाइयों के विवाह तक के मंगलमय प्रसंगों का सर्ग है।
शुभ स्वप्न और उसका वर्णन — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: देखि सुहावन सपन सुभ सगुन सुमंगल पाइ। कहहिं भूप सन मुदित मन हर्ष न हृदयँ समाइ॥४॥
शब्दार्थ:
- देखि = देखकर
- सुहावन सपन = सुहावना स्वप्न
- सगुन सुमंगल पाइ = मंगलमय शकुन पाकर
- कहहिं = कहती हैं
- भूप सन = महाराज से
- मुदित मन = प्रसन्न मन से
- हर्ष न हृदयँ समाइ = प्रसन्नता हृदय में समाती नहीं
देखि सुहावन सपन सुभ = सुहावना शुभ स्वप्न देखकर। हर्ष न हृदयँ समाइ = प्रसन्नता हृदय में समाती नहीं।
भावार्थ / व्याख्या:
सुहावना स्वप्न देखकर तथा मंगलमय शकुन पाकर रानियाँ प्रसन्न मन से उसका वर्णन महाराज दशरथ से करती हैं। उनकी प्रसन्नता हृदय में समाती नहीं, बाहर छलक पड़ती है।
इस दोहे में एक सुंदर व्यावहारिक बात है — शुभ अनुभव को बाँटने से आनंद बढ़ता है। रानियों ने स्वप्न अपने तक नहीं रखा, महाराज से कहा।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है। यह उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ स्वप्न, संकेत या पूर्वाभास प्रश्न का विषय हो। यह बताता है कि जो शुभ संकेत मिल रहे हैं, वे सच्चे हैं और उन्हें किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करना लाभकारी होगा।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- स्वप्न, संकेत या पूर्वाभास का अर्थ
- कोई शुभ समाचार साझा करने का अवसर
- घर में प्रसन्नता और उल्लास का वातावरण
- पति-पत्नी या परिवार में खुलकर बातचीत
- आने वाले शुभ अवसर की तैयारी
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। जो शुभ संकेत मिल रहे हैं वे सच्चे हैं। अपनी प्रसन्नता अपनों के साथ बाँटें — वह और बढ़ेगी।
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