रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 7 श्लोक 4 — अथाह समुद्र देखकर वानरों का विषाद; भारी कठिनाई बीत जाने और छुटकारे का शकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। तृतीय सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें चौथा दोहा — इस सर्ग में शुभ और अशुभ का अंतर बहुत स्पष्ट दिखाई देता है।
अथाह समुद्र के सामने असमंजस — कठिनाई बीत जाएगी।
मूल दोहा: बनचर बिकल बिषाद बस, देखि उदधि अवगाह। असमंजस बढ़ सगुन गत, बिधि बस होइ निबाह॥४॥
शब्दार्थ:
- बनचर = वनचर, वानर
- बिकल = व्याकुल
- बिषाद बस = दुःख के वश
- उदधि = समुद्र
- अवगाह = अथाह, गहरा
- असमंजस = दुविधा, कठिनाई
- बढ़ = बड़ी
- सगुन गत = शकुन बीत जाएगा
- बिधि बस = भाग्यवश
- निबाह = निभाव, छुटकारा
देखि उदधि अवगाह = अथाह समुद्र को देखकर। असमंजस बढ़ सगुन गत, बिधि बस होइ निबाह = भारी कठिनाई बीत जाएगी और भाग्यवश छुटकारा होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
अथाह समुद्र को देखकर सभी वानर दुःख से व्याकुल हो गए। इतनी दूर आकर भी अब सामने एक ऐसी बाधा थी जिसे पार करना असंभव लग रहा था।
तुलसीदास जी इसका शकुन-फल आशा देने वाला बताते हैं — जो भारी कठिनाई आई है, वह बीत जाएगी और भाग्यवश उससे छुटकारा हो जाएगा।
यह दोहा उन प्रश्नकर्ताओं के लिए है जो किसी ऐसी बाधा के सामने खड़े हैं जो अपार लग रही है। शकुन बताता है कि यह स्थिति स्थायी नहीं है। जिस समुद्र को देखकर वानर निराश हुए थे, उसी पर आगे चलकर सेतु बना।
शकुन फल:
यह शकुन भारी कठिनाई के बीत जाने का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- कोई अपार या असंभव लगने वाली बाधा
- लंबी यात्रा के बीच आई हुई रुकावट
- दुविधा और असमंजस की स्थिति
- निराशा या हार मान लेने का विचार
- संसाधनों की कमी से रुका हुआ कार्य
इस दोहे के आने पर कठिनाई बीत जाने का संकेत है। जो बाधा अपार लग रही है वह पार होगी। हार न मानें — मार्ग निकलेगा।
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