रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 7 श्लोक 3 — गुफा में तपस्विनी से भेंट और जल-फल की प्राप्ति; साधक-दर्शन और अभीष्ट सिद्धि का शुभ शकुन।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। तृतीय सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें तीसरा दोहा — इस सर्ग में शुभ और अशुभ का अंतर बहुत स्पष्ट दिखाई देता है।
स्वयंप्रभा की गुफा — साधक के दर्शन और अभीष्ट कार्य की पूर्ण सफलता।
मूल दोहा: पैठि बिबर मिलि तापसिहि अँचइ पानि फलु खाइ। सगुन सिद्ध साधक दरस अभिमत होइ अघाइ॥३॥
शब्दार्थ:
- पैठि बिबर = गुफा में प्रवेश करके
- तापसिहि = तपस्विनी से
- अँचइ = जल पिया
- पानि = जल
- फलु खाइ = फल खाए
- सिद्ध साधक = सिद्ध और साधक
- दरस = दर्शन
- अभिमत = अभीष्ट कार्य
- अघाइ = पूर्ण रूप से, तृप्ति तक
पैठि बिबर मिलि तापसिहि = गुफा में प्रवेश कर तपस्विनी से मिले। अभिमत होइ अघाइ = अभीष्ट कार्य पूर्ण रूप से सफल होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
हनुमानजी आदि वानर वीर गुफा में प्रविष्ट होकर तपस्विनी स्वयंप्रभा से मिले, वहाँ जल पिया और फल खाए।
यह प्रसंग उस समय आया जब वानर भूख-प्यास से व्याकुल थे और खोज असफल होती दिख रही थी। उसी क्षण एक अप्रत्याशित सहायता मिली।
तुलसीदास जी इसका फल बताते हैं — किसी साधक का दर्शन होगा और अभीष्ट कार्य पूर्ण रूप से सफल होगा। शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है, विशेषकर उन प्रश्नों में जहाँ थकान या निराशा के बीच सहायता की आवश्यकता हो।
शकुन फल:
यह शकुन साधक-दर्शन और अभीष्ट कार्य की पूर्ण सफलता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- थकान या निराशा के बीच मिलने वाली सहायता
- किसी संत, साधक या ज्ञानी से भेंट
- अभीष्ट कार्य की पूर्ण सफलता
- विश्राम, भोजन या आश्रय की व्यवस्था
- अप्रत्याशित स्रोत से मिलने वाला सहयोग
इस दोहे के आने पर अभीष्ट कार्य पूर्ण रूप से सफल होगा। बीच में विश्राम और सहायता भी मिलेगी — निराश न हों।
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