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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 3

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 6 श्लोक 3 — सुग्रीव द्वारा सीता-खोज हेतु वानरों की विदाई; आलस्य त्यागकर प्रयत्न करने पर सफलता का शकुन।

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शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। इस छठे सप्तक के तीसरा दोहे में तृतीय सर्ग का वह भाव है जहाँ मार्ग कठिन होने पर भी सहायक मिल ही जाते हैं।

सुग्रीव द्वारा वानरों की विदाई — आलस्य त्यागकर प्रयत्न करने का आदेश।

मूल दोहा: सीय सोध कपि भालु सब बिदा किए कपिनाथ। जतन करहु आलस तजहु नाइ राम पद माथ॥३॥

शब्दार्थ:

  • सीय सोध = सीताजी की खोज
  • कपि भालु = वानर और भालू
  • बिदा किए = विदा किया
  • कपिनाथ = वानरराज सुग्रीव
  • जतन करहु = प्रयत्न करो
  • आलस तजहु = आलस्य त्याग दो
  • नाइ राम पद माथ = श्रीराम के चरणों में मस्तक झुकाकर

सीय सोध कपि भालु सब बिदा किए = सीता की खोज के लिए सब वानर-भालुओं को विदा किया। जतन करहु आलस तजहु = प्रयत्न करो, आलस्य त्याग दो।

भावार्थ / व्याख्या:

वानरराज सुग्रीव ने सीताजी का पता लगाने के लिए सब वानर-भालुओं को चारों दिशाओं में विदा किया।

तुलसीदास जी इसका शकुन-फल एक सीधे आदेश के रूप में देते हैं — श्रीराम के चरणों में मस्तक झुकाकर प्रयत्न करो और आलस्य त्याग दो, कार्य सफल होगा।

इस दोहे में एक महत्वपूर्ण संतुलन है — भक्ति और पुरुषार्थ दोनों। केवल चरणों में सिर झुकाना पर्याप्त नहीं, प्रयत्न भी आवश्यक है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है, परंतु एक शर्त के साथ — फल तभी मिलेगा जब परिश्रम किया जाए। यह उन लोगों के लिए स्पष्ट संदेश है जो प्रतीक्षा कर रहे हैं पर प्रयत्न नहीं कर रहे।

शकुन फल:

यह शकुन आलस्य त्यागकर प्रयत्न करने पर सफलता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • कोई खोज, तलाश या अन्वेषण का कार्य
  • ऐसा कार्य जिसमें आप ढील दे रहे हों
  • अनेक दिशाओं में एक साथ प्रयत्न
  • टीम को काम सौंपना या ज़िम्मेदारी बाँटना
  • परिश्रम और भाग्य के संतुलन का प्रश्न

इस दोहे के आने पर सफलता निश्चित है, पर एक शर्त के साथ — आलस्य त्यागकर पूरा प्रयत्न करें। केवल प्रार्थना से नहीं, परिश्रम से काम बनेगा।

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