रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 6 श्लोक 2 — वर्षा ऋतु में राम-लक्ष्मण का पर्वत पर निवास; कार्य में विलंब पर अच्छे परिणाम का शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। इस छठे सप्तक के दूसरा दोहे में तृतीय सर्ग का वह भाव है जहाँ मार्ग कठिन होने पर भी सहायक मिल ही जाते हैं।
वर्षाकाल में पर्वत पर निवास — कार्य में देरी, पर परिणाम अच्छा।
मूल दोहा: कीन्ह बास बरषा निरखि गिरिबर सानुज राम। काज बिलंबित सगुन फल होइहि भल परिनाम॥२॥
शब्दार्थ:
- कीन्ह बास = निवास किया
- बरषा = वर्षा ऋतु
- निरखि = देखकर
- गिरिबर = श्रेष्ठ पर्वत
- सानुज = छोटे भाई सहित
- काज बिलंबित = कार्य में विलंब
- होइहि = होगा
- भल परिनाम = अच्छा परिणाम
कीन्ह बास बरषा निरखि = वर्षा ऋतु देखकर निवास किया। काज बिलंबित होइहि भल परिनाम = कार्य में देर होगी, पर परिणाम अच्छा होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
वर्षा ऋतु देखकर छोटे भाई लक्ष्मण के साथ श्रीराम ने प्रवर्षण पर्वत पर निवास किया। सीता की खोज तत्काल संभव नहीं थी, इसलिए वर्षा बीतने की प्रतीक्षा करनी पड़ी।
तुलसीदास जी इस शकुन का फल स्पष्ट बताते हैं — कार्य की सफलता में देर होगी, किंतु परिणाम अच्छा होगा।
यह रामाज्ञा प्रश्न के सबसे व्यावहारिक दोहों में से एक है। यह न पूर्ण ‘हाँ’ कहता है, न ‘नहीं’ — बल्कि ‘हाँ, पर देर से’ कहता है। शकुन की दृष्टि से यह उन प्रश्नकर्ताओं के लिए है जो अधीर हो रहे हैं। संदेश यह है कि प्रतीक्षा व्यर्थ नहीं जाएगी।
शकुन फल:
यह शकुन विलंब पर अच्छे परिणाम का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- ऐसा कार्य जिसमें अपेक्षा से अधिक समय लग रहा हो
- रुका हुआ या अटका हुआ काम
- प्रतीक्षा करें या आगे बढ़ें — इस दुविधा में
- मौसम या बाहरी परिस्थिति पर निर्भर कार्य
- धैर्य और सही समय की प्रतीक्षा से जुड़ा प्रश्न
इस दोहे के आने पर कार्य में देर होगी, पर परिणाम अच्छा होगा। अधीर न हों — प्रतीक्षा करना ही इस समय की सही रणनीति है।
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