रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 6 श्लोक 1 — भाई से विरोध पर कुल का अकुशल; रावण और बालि के पतन का दृष्टांत, करोड़ों कुचक्रों का अपशकुन।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। इस छठे सप्तक के पहला दोहे में तृतीय सर्ग का वह भाव है जहाँ मार्ग कठिन होने पर भी सहायक मिल ही जाते हैं।
भाई से विरोध का परिणाम — करोड़ों कुचक्रों का सूचक अपशकुन।
मूल दोहा: बंधु बिरोध न कुसल कुल कुसगुन कोटि कुचालि। रावन रबि को राहु सो भयो काल बस बालि॥१॥
शब्दार्थ:
- बंधु बिरोध = भाई से विरोध
- कुसल = कुशल, भलाई
- कुल = वंश, परिवार
- कुसगुन = अपशकुन
- कोटि = करोड़ों
- कुचालि = कुचक्र, षड्यंत्र
- रबि = सूर्य
- राहु = राहु
- काल बस = काल के वश, मृत
बंधु बिरोध न कुसल कुल = भाई से विरोध करने पर कुल का कुशल नहीं होता। भयो काल बस बालि = उसी से बालि काल के वश हुआ।
भावार्थ / व्याख्या:
तुलसीदास जी एक सार्वभौमिक सत्य बताते हैं — भाई से विरोध करने पर कुल का कुशल नहीं होता।
प्रमाण के रूप में वे दो उदाहरण देते हैं। विभीषण से विरोध रावण रूपी सूर्य के लिए राहु बन गया, और सुग्रीव से विरोध के कारण बालि काल के वश हो गया। दोनों अत्यंत बलशाली थे, पर दोनों का पतन भाई से वैर के कारण हुआ।
शकुन की दृष्टि से यह अपशकुन करोड़ों कुचक्रों का सूचक है। यह उन प्रश्नों में स्पष्ट चेतावनी देता है जहाँ भाई-बहन, साझेदार या निकट संबंधी से विवाद चल रहा हो। संदेश स्पष्ट है — यह विवाद आपको ही नष्ट करेगा, चाहे आप कितने ही सही क्यों न हों।
शकुन फल:
यह अपशकुन करोड़ों कुचक्रों का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष चेतावनी:
- भाई-बहन या निकट संबंधी से विवाद
- पैतृक संपत्ति का बँटवारा या मुकदमा
- व्यावसायिक साझेदार से टकराव
- परिवार में गुटबाज़ी या अलगाव
- किसी अपने के विरुद्ध उठाया जा रहा कदम
इस दोहे के आने पर अपने ही परिवार या साझेदारों से विरोध अत्यंत हानिकारक सिद्ध होगा। समझौते का मार्ग खोजें — बालि और रावण दोनों का पतन इसी भूल से हुआ था।
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