रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 7 — तुलसी की मंजरी कल्याण की जड़ और कल्पलता समान अभीष्टदाता; श्रेष्ठ शकुन-फल।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ पढ़ते समय दोहे का अर्थ और उसका शकुन-फल — दोनों को साथ रखकर विचार करना उचित माना गया है। यह दोहा तृतीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से सातवाँ है — यहाँ विरह, खोज और कठिनाई से पार पाने के संकेत मिलते हैं।
तुलसी की मंजरी की महिमा — यह शकुन-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: तुलसी तुलसी मंजरीं, मंगल मंजुल मूल। देखत सुमिरत सगुन सुभ, कलपलता फल फूल॥७॥
शब्दार्थ:
- तुलसी मंजरीं = तुलसी की मंजरी
- मंगल = कल्याण
- मंजुल = सुंदर
- मूल = जड़
- देखत = देखने से
- सुमिरत = स्मरण करने से
- कलपलता = कल्पलता
- फल फूल = फल और पुष्प
तुलसी मंजरीं मंगल मंजुल मूल = तुलसी की मंजरी उत्तम कल्याण की जड़ है। कलपलता फल फूल = कल्पलता के फल-पुष्प के समान अभीष्ट फल देने वाली है।
भावार्थ / व्याख्या:
तुलसीदास जी कहते हैं कि तुलसी की मंजरी उत्तम कल्याण की जड़ है। उसका दर्शन और स्मरण शुभ शकुन है और वह कल्पलता के फल-पुष्प के समान अभीष्ट फल देने वाली है।
तुलसी का पौधा भारतीय घरों में सदा से पूजनीय रहा है — औषधीय गुणों के कारण भी और धार्मिक महत्व के कारण भी। तुलसीदास जी का अपना नाम भी इसी से जुड़ा है।
इस दोहे में एक सुंदर बात है — यहाँ किसी बड़ी साधना या कठिन उपाय की बात नहीं है। केवल तुलसी की मंजरी के दर्शन मात्र से शुभ फल का वचन है। शकुन की दृष्टि से इसे तुलसीदास जी ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं, जो सर्वोच्च श्रेणी है।
शकुन फल:
यह शकुन-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित सभी प्रश्नों में अत्यंत अनुकूल:
- कोई भी अभीष्ट कामना या मनोरथ
- घर की सुख-शांति और शुद्धि
- पूजा, व्रत या धार्मिक अनुष्ठान
- स्वास्थ्य और आरोग्य से जुड़ा प्रश्न
- सरल उपाय से बड़े फल की आशा
इस दोहे के आने पर शकुन-फल श्रेष्ठ है। घर में तुलसी की सेवा करें — अभीष्ट फल अवश्य मिलेगा। बड़े उपाय की आवश्यकता नहीं, सरल श्रद्धा पर्याप्त है।
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