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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 1

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 5 श्लोक 1 — कबंध द्वारा दोनों भाइयों का पकड़ा जाना; शोक, विपत्ति और भूत-प्रेत पीड़ा का सूचक शकुन।

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गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। तृतीय सर्ग के पाँचवें सप्तक का पहला दोहा प्रस्तुत है, जिसके दोहे बताते हैं कि सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है।

कबंध का प्रसंग — शोक, विपत्ति और भूत-प्रेत पीड़ा का सूचक।

मूल दोहा: खल बल अंध कबंध बस परे सुबंधु समेत। सगुन सोच संकट कहब, भूत प्रेत दुख देत॥१॥

शब्दार्थ:

  • खल = दुष्ट
  • बल अंध = बल के गर्व से अंधा
  • कबंध = कबंध राक्षस
  • बस परे = चंगुल में पड़ गए
  • सुबंधु समेत = श्रेष्ठ भाई के साथ
  • सोच = शोक
  • संकट = विपत्ति
  • भूत प्रेत = भूत-प्रेत
  • दुख देत = दुःख देने वाले

खल बल अंध कबंध बस परे = बल के गर्व से अंधे दुष्ट कबंध के चंगुल में पड़ गए। भूत प्रेत दुख देत = भूत-प्रेत की पीड़ा का सूचक है।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रेष्ठ भाई लक्ष्मण के साथ प्रभु बल के गर्व से अंधे दुष्ट कबंध के चंगुल में पड़ गए — उसने अपनी विशाल भुजाओं में दोनों भाइयों को पकड़ लिया।

तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन शोक, विपत्ति तथा भूत-प्रेत की पीड़ा का सूचक है।

कबंध का स्वरूप ही विचित्र था — बिना सिर का, केवल धड़ और विशाल भुजाओं वाला। यह उस अंधी शक्ति का प्रतीक है जो विवेक के बिना केवल पकड़ना जानती है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है और किसी ऐसी उलझन का संकेत देता है जिसमें फँसने के बाद निकलना कठिन हो। साथ ही यह अकारण भय और मानसिक अशांति का भी सूचक है।

शकुन फल:

यह शकुन शोक, विपत्ति और भय का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में सावधानी:

  • किसी उलझन या जाल में फँसने की आशंका
  • ऐसा अनुबंध जिससे निकलना कठिन हो
  • अकारण भय, बेचैनी या मानसिक अशांति
  • किसी बलशाली परंतु विवेकहीन व्यक्ति से सामना
  • अचानक आने वाली विपत्ति

इस दोहे के आने पर शोक और विपत्ति का संकेत है। किसी भी बंधनकारी अनुबंध या स्थिति में प्रवेश न करें। श्रीराम का स्मरण करें — कबंध का भी अंत में उद्धार ही हुआ था।

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