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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 6

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 6 — लक्ष्मणजी की मधुर मूर्ति का प्रेमपूर्वक स्मरण; सुख, संपत्ति, कीर्ति और विजय का घर कहा गया शकुन।

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तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। यह दोहा तृतीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से छठा है — यहाँ विरह, खोज और कठिनाई से पार पाने के संकेत मिलते हैं।

लक्ष्मणजी का प्रेमपूर्वक स्मरण — सुख, संपत्ति, कीर्ति और विजय का घर।

मूल दोहा: लखन ललित मूरति मधुर सुमिरहु सहित सनेह। सुख संपति कीरति बिजय सगुन सुमंगल गेह॥६॥

शब्दार्थ:

  • लखन = लक्ष्मणजी
  • ललित = सुंदर
  • मूरति मधुर = मधुर मूर्ति
  • सुमिरहु = स्मरण करो
  • सहित सनेह = प्रेमपूर्वक
  • सुख = सुख
  • संपति = संपत्ति
  • कीरति = कीर्ति
  • सुमंगल गेह = मंगलों का घर

सुमिरहु सहित सनेह = प्रेमपूर्वक स्मरण करो। सगुन सुमंगल गेह = यह शकुन सुमंगलों का घर ही है।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीलक्ष्मणजी की मधुरिमामयी सुंदर मूर्ति का प्रेमपूर्वक स्मरण करो। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन सुख, संपत्ति, कीर्ति और विजय आदि सुमंगलों का घर ही है।

‘गेह’ अर्थात् घर शब्द विशेष है। घर वह स्थान है जहाँ चीज़ें स्थायी रूप से रहती हैं, आती-जाती नहीं। अर्थात् यहाँ जो सुख, संपत्ति और कीर्ति मिलेगी, वह क्षणिक नहीं बल्कि टिकाऊ होगी।

लक्ष्मणजी ने चौदह वर्ष निःस्वार्थ सेवा की, बिना किसी अपेक्षा के। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष शुभ है जहाँ निःस्वार्थ भाव से किए गए कार्य का फल प्रश्न का विषय हो।

शकुन फल:

यह शकुन सुख, संपत्ति, कीर्ति और विजय का घर है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • स्थायी सुख और आर्थिक स्थिरता
  • घर, संपत्ति या स्थायी निवास
  • निःस्वार्थ भाव से की गई सेवा का फल
  • नाम, यश और सामाजिक प्रतिष्ठा
  • छोटे भाई या सहयोगी से जुड़ा प्रश्न

इस दोहे के आने पर सुख, संपत्ति, कीर्ति और विजय — चारों का संकेत मिलता है, और वह भी स्थायी रूप में। प्रेमपूर्वक अपना कार्य करते रहें।

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