रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 5 — सीताजी के चरण-प्रणाम और नियमित नाम-स्मरण से स्त्रियों को पति-प्रेम की प्राप्ति का शकुन।
जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। यह दोहा तृतीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से पाँचवाँ है — यहाँ विरह, खोज और कठिनाई से पार पाने के संकेत मिलते हैं।
सीताजी का नाम-स्मरण — स्त्रियों को पति-प्रेम की प्राप्ति का शकुन।
मूल दोहा: सीता चरन प्रनाम करि, सुमिरि सुनाम सनेम। सुतिय होहिं पतिदेवता, प्राननाथ प्रिय प्रेम॥५॥
शब्दार्थ:
- सीता चरन = सीताजी के चरण
- प्रनाम करि = प्रणाम करके
- सुनाम = सुंदर नाम
- सनेम = नियमपूर्वक
- सुतिय = उत्तम स्त्रियाँ
- पतिदेवता = पतिव्रता
- प्राननाथ = प्राणनाथ, पति
- प्रिय प्रेम = प्रियतम का प्रेम
सीता चरन प्रनाम करि, सुमिरि सुनाम सनेम = सीताजी के चरणों में प्रणाम करके नियमपूर्वक उनका नाम स्मरण करने से। प्राननाथ प्रिय प्रेम = प्रियतम का प्रेम प्राप्त होता है।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीजानकीजी के चरणों में प्रणाम करके और उनके सुंदर नाम का नियमपूर्वक स्मरण करके उत्तम स्त्रियाँ पतिव्रता होती हैं और अपने प्राणनाथ का प्रेम प्राप्त करती हैं।
इस दोहे में ‘सनेम’ अर्थात् नियमपूर्वक शब्द महत्वपूर्ण है। एक बार का स्मरण नहीं, बल्कि नियमित अभ्यास फल देता है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा दांपत्य जीवन और स्त्रियों से जुड़े प्रश्नों में विशेष शुभ है। यह उन प्रश्नों में अनुकूल उत्तर देता है जहाँ पति-पत्नी के संबंध, आपसी प्रेम या गृहस्थ जीवन की सुख-शांति विषय हो।
शकुन फल:
यह शकुन स्त्रियों को पति-प्रेम की प्राप्ति का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- दांपत्य जीवन और पति-पत्नी का संबंध
- वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य
- रूठे जीवनसाथी से मेल-मिलाप
- विवाह और गृहस्थ सुख से जुड़े प्रश्न
- स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला व्रत या नियम
इस दोहे के आने पर दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य का शुभ संकेत मिलता है। नियमपूर्वक सीताजी का स्मरण करने से संबंध मधुर होंगे।
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