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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 3

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 3 श्लोक 3 — रावण से युद्ध कर घायल जटायु की शोभा; कर्तव्य-पालन में यश पर बड़े त्याग का शकुन।

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शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। तृतीय सर्ग के तीसरे सप्तक का यह तीसरा दोहा है; इस सर्ग में वन-प्रवास और राक्षसों से संघर्ष के प्रसंग प्रमुख हैं।

जटायु का वीर संघर्ष — कर्तव्य-पालन में यश, पर बड़ा मूल्य चुकाना पड़ेगा।

मूल दोहा: गीधराज रावन समर घायल बीर बिराज। सूर सुजसु संग्राम महि मरन सुसाहिब काज॥३॥

शब्दार्थ:

  • गीधराज = गृध्रराज जटायु
  • समर = युद्ध
  • घायल = घायल
  • बिराज = सुशोभित हैं
  • सूर = वीर
  • सुजसु = सुयश
  • संग्राम महि = युद्धभूमि में
  • मरन = मृत्यु
  • सुसाहिब काज = श्रेष्ठ स्वामी के लिए

घायल बीर बिराज = घायल होकर भी वीर सुशोभित हैं। मरन सुसाहिब काज = श्रेष्ठ स्वामी के लिए मृत्यु होगी।

भावार्थ / व्याख्या:

वीर गृध्रराज जटायु रावण से युद्ध करके घायल पड़े हुए भी अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन बताता है कि संग्रामभूमि में वीर सुयश पाएँगे, परंतु श्रेष्ठ स्वामी के लिए उनकी मृत्यु होगी।

जटायु जानते थे कि वे रावण से नहीं जीत सकते। फिर भी वे लड़े, क्योंकि उनके लिए परिणाम से अधिक कर्तव्य महत्वपूर्ण था।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा मिश्रित परंतु गौरवपूर्ण फल देता है। यह बताता है कि जिस कार्य में आप उतर रहे हैं, उसमें यश और सम्मान अवश्य मिलेगा, परंतु उसकी बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ेगी। यदि कार्य धर्म और कर्तव्य का है, तो वह कीमत सार्थक होगी।

शकुन फल:

यह शकुन कर्तव्य-पालन में यश, पर बड़े मूल्य का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • किसी की रक्षा या सहायता के लिए उठाया जा रहा कदम
  • ऐसा कार्य जिसमें बड़ा त्याग आवश्यक हो
  • न्याय या सत्य के लिए किया जाने वाला संघर्ष
  • असमान मुकाबले में उतरने का निर्णय
  • यश और सम्मान से जुड़ा प्रश्न

इस दोहे के आने पर यश और सम्मान तो मिलेगा, परंतु बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। यदि कार्य धर्म और कर्तव्य का है तो अवश्य करें — जटायु की तरह आपका नाम भी अमर होगा।

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