रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 3 श्लोक 4 — राम-लक्ष्मण का सीताजी की खोज में वन-वन भटकना; भारी शोक और अमंगल का सूचक शकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। तृतीय सर्ग के तीसरे सप्तक का यह चौथा दोहा है; इस सर्ग में वन-प्रवास और राक्षसों से संघर्ष के प्रसंग प्रमुख हैं।
राम-लक्ष्मण का वन-वन भटकना — भारी शोक और अमंगल का सूचक।
मूल दोहा: राम लखनु बन बन बिकल फिरत सीय सुधि लेत। सूचत सगुन बिषादु बड़ असुभ अरिष्ट अचेत॥४॥
शब्दार्थ:
- बन बन = वन-वन में
- बिकल = व्याकुल
- फिरत = घूमते हैं
- सुधि लेत = पता लगाते हुए
- सूचत = सूचित करता है
- बिषादु बड़ = भारी शोक
- असुभ = अशुभ
- अरिष्ट = अमंगल
- अचेत = व्याकुल कर देने वाला
राम लखनु बन बन बिकल फिरत = श्रीराम-लक्ष्मण व्याकुल होकर वन-वन घूमते हैं। असुभ अरिष्ट अचेत = अशुभ और व्याकुल कर देने वाला अमंगल।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम और लक्ष्मण व्याकुल होकर वन-वन में सीताजी का पता लगाते घूमते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन भारी शोक, अशुभ और व्याकुल कर देने वाले अमंगल को सूचित करता है।
यह खोज की व्यर्थता और असहायता का चित्र है। स्वयं भगवान भी उस समय एक साधारण विरही की तरह भटक रहे थे।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है। यह उस स्थिति का संकेत देता है जहाँ किसी खोई हुई वस्तु, व्यक्ति या अवसर की तलाश की जा रही हो और वह प्रयास तत्काल सफल न हो रहा हो। इस समय बेचैनी में इधर-उधर भागने के बजाय व्यवस्थित ढंग से प्रयत्न करना अधिक उपयोगी होगा।
शकुन फल:
यह शकुन भारी शोक और अमंगल का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- खोई हुई वस्तु, व्यक्ति या दस्तावेज़ की तलाश
- लापता व्यक्ति या संपर्क टूट जाने की स्थिति
- लंबे समय से चल रही असफल खोज या प्रयास
- गहरी बेचैनी और मानसिक अशांति
- किसी अवसर के हाथ से निकल जाने की आशंका
इस दोहे के आने पर तत्काल सफलता की आशा न रखें। बेचैनी में भागने के बजाय व्यवस्थित प्रयत्न करें और सहायता लें। समय लगेगा, पर मार्ग निकलेगा।
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