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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 1

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 3 श्लोक 1 — मायामृग को पहचानकर भी प्रभु का जाना; छल और भ्रम की प्रबलता दर्शाने वाला शकुन।

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गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। तृतीय सर्ग के तीसरे सप्तक का यह पहला दोहा है; इस सर्ग में वन-प्रवास और राक्षसों से संघर्ष के प्रसंग प्रमुख हैं।

मायामृग का प्रसंग — यह शकुन ठगों और छल करने वालों के लिए हितकर है।

मूल दोहा: मायामृग पहिचानि प्रभु चले सीय रुचि जानि। बंचक चोर प्रपंच कृत सगुन कहब हित मानि॥१॥

शब्दार्थ:

  • मायामृग = माया से बना मृग
  • पहिचानि = पहचान लेने पर
  • सीय रुचि = जानकीजी की इच्छा
  • जानि = जानकर
  • बंचक = ठग
  • चोर = चोर
  • प्रपंच कृत = पाखंड करने वाले
  • हित मानि = हितकर समझो

मायामृग पहिचानि प्रभु चले = मायामृग को पहचानकर भी प्रभु चले। बंचक चोर प्रपंच कृत = ठग, चोर और पाखंडियों के लिए यह शकुन हितकर है।

भावार्थ / व्याख्या:

माया से बने उस मृग को पहचान लेने पर भी — कि यह राक्षस है — श्रीजानकीजी की इच्छा जानकर प्रभु उसे लाने चले।

तुलसीदास जी इस शकुन का एक असामान्य फल बताते हैं — ठग, चोर तथा पाखंडियों के लिए इस शकुन को हितकर समझो।

यह रामाज्ञा प्रश्न का एक अनोखा दोहा है। यह सीधे कहता है कि इस समय छल, दिखावा और भ्रम की शक्ति प्रबल है। शकुन की दृष्टि से इसका व्यावहारिक अर्थ यह है — यदि आपका प्रश्न किसी सीधे-सच्चे कार्य से जुड़ा है तो सावधान रहें, क्योंकि इस समय छल करने वाले सफल हो रहे हैं। जो चीज़ें आकर्षक दिख रही हैं, वे भ्रम हो सकती हैं।

शकुन फल:

यह शकुन बताता है कि इस समय छल और भ्रम की शक्ति प्रबल है। निम्नलिखित प्रश्नों में सतर्कता:

  • किसी आकर्षक दिखने वाली वस्तु या अवसर की खरीद
  • धोखाधड़ी, ठगी या चोरी की आशंका
  • किसी की बात पर विश्वास करके किया जा रहा निवेश
  • दिखावटी या भ्रामक प्रस्ताव
  • किसी की इच्छा पूरी करने के लिए लिया जा रहा जोखिम

इस दोहे के आने पर सतर्कता आवश्यक है। जो चीज़ आकर्षक दिख रही है वह छल हो सकती है। किसी की इच्छा पूरी करने के लिए भी अपना विवेक न छोड़ें।

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