रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 6 — दोनों ओर मृत्यु जानकर मारीच का स्वर्णमृग रूप धारण करना; छल और कपट का अशुभ शकुन।
तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। प्रस्तुत दोहा तृतीय सर्ग के दूसरे सप्तक में छठा स्थान पर है, जहाँ छल, कलह और आकस्मिक भय की चेतावनियाँ बार-बार मिलती हैं।
मारीच का स्वर्णमृग बनना — कपट और छल का अशुभ शकुन।
मूल दोहा: इत रावन उत राम कर मीचु जानि मारीच। कनक कपट मृग बेस तब कीन्ह निसाचर नीच॥६॥
शब्दार्थ:
- इत = इधर
- उत = उधर
- कर = के हाथों
- मीचु = मृत्यु
- जानि = जानकर
- कनक = स्वर्ण, सोना
- कपट मृग = कपटमय मृग
- बेस = वेष, रूप
- निसाचर नीच = नीच राक्षस (मारीच)
इत रावन उत राम कर मीचु = इधर रावण, उधर श्रीराम — दोनों ओर मृत्यु। कनक कपट मृग बेस = स्वर्णमृग का कपटमय रूप बनाया।
भावार्थ / व्याख्या:
इधर रावण के और उधर श्रीराम के हाथों — दोनों ओर मृत्यु निश्चित समझकर नीच राक्षस मारीच ने स्वर्णमृग का कपटमय रूप बनाया।
मारीच की स्थिति विवशता की पराकाष्ठा थी। वह जानता था कि श्रीराम कौन हैं और परिणाम क्या होगा, फिर भी रावण के भय से उसे यह कार्य करना पड़ा।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है। यह दो प्रकार की चेतावनी देता है — पहली, किसी के दबाव में आकर गलत कार्य करने की; और दूसरी, किसी आकर्षक दिखने वाली वस्तु या प्रस्ताव के पीछे छिपे छल की। स्वर्णमृग सुंदर था, पर वही विनाश का कारण बना।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल अशुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी:
- अत्यधिक आकर्षक दिखने वाला प्रस्ताव या अवसर
- किसी के दबाव में किया जा रहा गलत कार्य
- धोखाधड़ी या छल की आशंका वाला सौदा
- सोना, आभूषण या मूल्यवान वस्तु से जुड़ा लेन-देन
- ऐसी स्थिति जहाँ हर विकल्प हानिकारक लगे
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अशुभ है। जो चीज़ बहुत आकर्षक लग रही है, उसमें छल छिपा हो सकता है। किसी के दबाव में भी कोई गलत कदम न उठाएँ।
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