रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 4 — शूर्पणखा का लंका पहुँचना साढ़ेसाती के समान; राजा और प्रजा दोनों के लिए अनिष्ट सूचक शकुन।
सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। प्रस्तुत दोहा तृतीय सर्ग के दूसरे सप्तक में चौथा स्थान पर है, जहाँ छल, कलह और आकस्मिक भय की चेतावनियाँ बार-बार मिलती हैं।
साढ़ेसाती के समान अशुभ — राजा और प्रजा दोनों के लिए अनिष्ट सूचक।
मूल दोहा: सूपनखा सब भाँति गत असुभ अमंगल मूल। समय साढ़साती सरिस नृपहि प्रजहि प्रतिकूल॥४॥
शब्दार्थ:
- सब भाँति गत = सब प्रकार से
- असुभ अमंगल मूल = अशुभ और अमंगल की जड़
- साढ़साती = शनि की साढ़े सात वर्ष की दशा
- सरिस = के समान
- नृपहि = राजा के लिए
- प्रजहि = प्रजा के लिए
- प्रतिकूल = विपरीत, विपत्ति लाने वाली
समय साढ़साती सरिस = यह समय शनि की साढ़ेसाती के समान है। नृपहि प्रजहि प्रतिकूल = राजा और प्रजा दोनों के लिए प्रतिकूल।
भावार्थ / व्याख्या:
शनैश्चर की साढ़े सात वर्ष की दशा के समान सब प्रकार से अशुभ और अमंगल की जड़ शूर्पणखा, राजा रावण तथा उसकी प्रजा के लिए प्रतिकूल बनकर लंका पहुँची।
यहाँ तुलसीदास जी ने ज्योतिष का प्रत्यक्ष संदर्भ दिया है — साढ़ेसाती, जो शनि की सबसे कठिन दशा मानी जाती है और जिसमें व्यक्ति की सारी व्यवस्था हिल जाती है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा राजा और प्रजा — अर्थात् नेतृत्व और उसके अधीन लोग — दोनों के लिए अनिष्ट सूचक है। यह बताता है कि जो संकट आ रहा है, वह किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समूह, परिवार या संस्था को प्रभावित करेगा।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल राजा-प्रजा सबके लिए अनिष्ट सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- साढ़ेसाती या शनि दशा से जुड़ा प्रश्न
- संस्था, कंपनी या पूरे परिवार पर आने वाला संकट
- नेतृत्व और अधीनस्थ दोनों को प्रभावित करने वाला निर्णय
- लंबे समय तक चलने वाला कठिन दौर
- सामूहिक हानि या व्यापक प्रभाव वाली समस्या
इस दोहे के आने पर राजा-प्रजा दोनों के लिए अनिष्ट का संकेत है। यह कठिन दौर लंबा चल सकता है। संयम, सादगी और धैर्य से काम लें — शनि की दशा भी समय पर बीत जाती है।
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