रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 1 श्लोक 7 — सीता-लक्ष्मण सहित प्रभु की शोभा और देवताओं की पुष्प-वर्षा; सुमंगल का निवासरूप शकुन।
प्रश्न पूछने की परंपरा में मन को एकाग्र कर, श्रीराम का स्मरण करते हुए सर्ग, सप्तक और दोहा — तीनों संख्याएँ चुनी जाती हैं। यह पहले सप्तक का सातवाँ दोहा है। तृतीय सर्ग में शूर्पणखा, खर-दूषण और सीता-हरण जैसे प्रसंग आते हैं, इसलिए इसके कई दोहे अपशकुन सूचक हैं।
सप्तक का समापन — देवताओं की पुष्प-वर्षा, सुमंगल का निवास।
मूल दोहा: सीता लखन समेत प्रभु सोहत तुलसीदास। हरषत सुर बरषत सुमन सगुन सुमंगल बास॥७॥
शब्दार्थ:
- समेत = के साथ
- सोहत = सुशोभित हैं
- हरषत = प्रसन्न होकर
- सुर = देवता
- बरषत सुमन = पुष्प-वर्षा करते हैं
- सुमंगल बास = मंगल का निवास
सीता लखन समेत प्रभु सोहत = जानकी और लक्ष्मणजी के साथ प्रभु सुशोभित हैं। सगुन सुमंगल बास = यह शकुन सुमंगल का निवासरूप है।
भावार्थ / व्याख्या:
तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभु श्रीराम, श्रीजानकीजी और लक्ष्मणजी के साथ सुशोभित हैं। देवता प्रसन्न होकर पुष्प-वर्षा कर रहे हैं। यह शकुन सुमंगल का निवासरूप है।
इस सप्तक की रचना ध्यान देने योग्य है। आरंभ परम शुभ दोहे से हुआ, बीच में शूर्पणखा, खर-दूषण और युद्ध के अशुभ प्रसंग आए, और अंत फिर मंगल पर हो रहा है।
‘सुमंगल बास’ अर्थात् मंगल का निवास — यह केवल क्षणिक शुभता नहीं, बल्कि स्थायी मंगल का संकेत है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा बताता है कि विपत्ति का दौर बीत गया है और अब शांति तथा शुभता का काल आ रहा है।
शकुन फल:
यह शकुन सुमंगल का निवासरूप है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम शुभ रहेगा:
- कठिन दौर के बाद शांति और स्थिरता
- किसी संकट या संघर्ष का समापन
- परिवार में सुख-शांति की वापसी
- कोई भी शुभ कार्य या मांगलिक आयोजन
- स्थायी सफलता और प्रतिष्ठा
इस दोहे के आने पर सुमंगल के निवास का संकेत मिलता है। कठिन दौर बीत चुका है — अब शांति और शुभता का समय है।
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