रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 7 श्लोक 4 — गोदावरी तट पर श्रीराम के संरक्षण में मुनियों का निर्भय जप-तप; साधना निर्विघ्न सफल होने का शकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। द्वितीय सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें चौथा दोहा — इस सर्ग के शकुन प्रायः धैर्य रखने का संकेत देते हैं।
गोदावरी तट पर निर्भय साधना — जप-तप निर्विघ्न सफल होने का शकुन।
मूल दोहा: मोदाकर गोदावरी, बिपिन सुखद सब काल। निर्भय मुनि जप तप करहिं, पालक राम कृपाल॥४॥
शब्दार्थ:
- मोदाकर = आनंददायिनी
- गोदावरी = गोदावरी नदी
- बिपिन = वन
- सुखद सब काल = सभी समय सुखदायी
- निर्भय = भयरहित
- जप तप = जप और तपस्या
- पालक = रक्षक
- कृपाल = कृपालु
मोदाकर गोदावरी = गोदावरी आनंददायिनी है। निर्भय मुनि जप तप करहिं = मुनिगण निर्भय होकर जप-तप करते हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
गोदावरी नदी आनंददायिनी है और वन सभी समय सुखदायी है। अब कृपालु श्रीराम के रक्षक होने से वहाँ मुनिगण भयरहित होकर जप-तप करते हैं।
‘निर्भय’ शब्द इस दोहे का केंद्र है। साधना के लिए सबसे आवश्यक है निर्भयता — भय से भरा मन एकाग्र नहीं हो सकता। जब तक राक्षसों का भय था, मुनि साधना नहीं कर पाते थे।
तुलसीदास जी इसका फल स्पष्ट बताते हैं — साधन और भजन निर्विघ्न सफल होंगे। शकुन की दृष्टि से यह दोहा साधना, अध्ययन और एकाग्रता वाले कार्यों में विघ्न-रहित सफलता का आश्वासन देता है।
शकुन फल:
यह शकुन साधना और भजन के निर्विघ्न सफल होने का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- जप, तप, साधना या अनुष्ठान का संकल्प
- अध्ययन, शोध या एकाग्रता वाला कार्य
- किसी विघ्न या बाधा की आशंका
- भय, असुरक्षा या मानसिक अशांति
- लंबे समय तक चलने वाला अनुशासित प्रयत्न
इस दोहे के आने पर साधन और भजन निर्विघ्न सफल होंगे। भय त्यागें — रक्षा की व्यवस्था है, एकाग्र होकर अपना कार्य करें।
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