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रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 5 श्लोक 5 — चरण-पादुका और आशीर्वाद लेकर भरतजी की संतप्त वापसी; यह प्रश्न-फल अशुभ है।

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तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। द्वितीय सर्ग के पाँचवें सप्तक का पाँचवाँ दोहा प्रस्तुत है, जिसमें अयोध्या से चित्रकूट तक की यात्रा के संकेत छिपे हैं।

चरण-पादुका लेकर भरतजी की वापसी — यह प्रश्न-फल अशुभ है।

मूल दोहा: सुनि सिख आसिष पाँवरी पाइ नाइ पद माथ। चले अवध संताप बस बिकल लोग सब साथ॥५॥

शब्दार्थ:

  • सुनि सिख = शिक्षा सुनकर
  • आसिष = आशीर्वाद
  • पाँवरी = चरण-पादुका, खड़ाऊँ
  • पाइ = पाकर
  • नाइ पद माथ = चरणों में मस्तक झुकाकर
  • संताप बस = संतापवश, दुःखित चित्त
  • बिकल = व्याकुल

आसिष पाँवरी पाइ = आशीर्वाद और चरण-पादुका पाकर। चले अवध संताप बस = संतापवश अयोध्या चले।

भावार्थ / व्याख्या:

प्रभु की शिक्षा सुनकर, आशीर्वाद तथा चरण-पादुका पाकर एवं उनके चरणों में मस्तक झुकाकर भरतजी दुःखित चित्त से अयोध्या लौट चले। साथ के सभी लोग व्याकुल हैं।

भरतजी जो लेने आए थे — श्रीराम — वह नहीं मिला। जो मिला वह पादुका थी। यह अधूरी सफलता थी, या कहें सम्मानजनक असफलता।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है। यह बताता है कि जिस उद्देश्य से प्रयास किया जा रहा है, वह पूरा नहीं होगा — कुछ आंशिक या प्रतीकात्मक ही हाथ आएगा। परंतु यह भी स्मरण रहे कि भरतजी ने उसी पादुका से चौदह वर्ष राज्य चलाया — अर्थात् जो मिला, उसी में मार्ग निकल सकता है।

शकुन फल:

यह शकुन अशुभ है और अधूरी सफलता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • किसी माँग या अनुरोध का पूर्ण न होना
  • आंशिक सफलता या समझौते की स्थिति
  • लंबी प्रतीक्षा के बाद अधूरा परिणाम
  • किसी की वापसी या लौटने की आशा
  • भारी मन से लिया जाने वाला निर्णय

इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अशुभ है — पूर्ण सफलता नहीं मिलेगी। परंतु जो थोड़ा भी मिले, उसे स्वीकार करें और उसी से मार्ग बनाएँ, जैसे भरतजी ने पादुका से राज्य चलाया।

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