रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 5 श्लोक 2 — पिता की मृत्यु और राम-वियोग पर भरतजी का विलाप; यह प्रश्न-फल निकृष्ट है।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। द्वितीय सर्ग के पाँचवें सप्तक का दूसरा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें अयोध्या से चित्रकूट तक की यात्रा के संकेत छिपे हैं।
भरतजी का विलाप — यह प्रश्न-फल निकृष्ट है।
मूल दोहा: भूप मरनु प्रभु बन गवनु सब बिधि अवध अनाथ। रीवत समुझि कुमात कृत्त, मीजि हाथ धुनि माथ॥२॥
शब्दार्थ:
- भूप मरनु = राजा की मृत्यु
- बन गवनु = वन जाना
- सब बिधि = सब प्रकार से
- अनाथ = अनाथ, असहाय
- रीवत = रोते हैं
- कुमात = दुष्ट हृदय वाली माता
- कृत्त = करतूत
- मीजि हाथ = हाथ मलते हुए
- धुनि माथ = सिर पीटते हुए
सब बिधि अवध अनाथ = सब प्रकार से अयोध्या अनाथ हो गई। मीजि हाथ धुनि माथ = हाथ मलते और सिर पीटते हुए रोते हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज दशरथ की मृत्यु, प्रभु श्रीराम का वन जाना तथा सब प्रकार से अयोध्या का अनाथ हो जाना — इन सबको दुष्टहृदया माता कैकेयी की करतूत समझकर भरतजी हाथ मलते और सिर पीटकर रोते हैं।
इस दोहे में शोक की पराकाष्ठा है। एक साथ तीन विपत्तियाँ — पिता की मृत्यु, भाई का वियोग और राज्य का अनाथ होना।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा निकृष्ट फल का सूचक है। यह एक साथ कई ओर से आने वाली कठिनाइयों का संकेत देता है। ऐसे समय में सबसे बड़ी भूल होती है भावावेश में निर्णय लेना। भरतजी ने भी पहले विलाप किया, पर बाद में धैर्य से मार्ग निकाला।
शकुन फल:
यह शकुन निकृष्ट फल का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सतर्कता:
- एक साथ कई ओर से आने वाली समस्याएँ
- परिवार में मृत्यु, बीमारी या बड़ा संकट
- संपत्ति या व्यवसाय पर आया गंभीर संकट
- पारिवारिक कलह जिसका दोष किसी एक पर हो
- भावावेश या क्रोध में लिया जा रहा निर्णय
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल निकृष्ट है। इस समय कोई निर्णय न लें, किसी को दोष न दें। धैर्य रखें — भरतजी ने भी धैर्य से ही मार्ग निकाला था।
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