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रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 3

रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 5 श्लोक 3 — पिता का अंत्येष्टि-कर्म कर भरतजी का सबको साथ लेकर चित्रकूट प्रस्थान; कर्तव्य-पालन का संकेत।

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शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। द्वितीय सर्ग के पाँचवें सप्तक का तीसरा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें अयोध्या से चित्रकूट तक की यात्रा के संकेत छिपे हैं।

पिता का अंत्येष्टि-कर्म कर भरतजी का चित्रकूट प्रस्थान।

मूल दोहा: बेदबिहित पितु करम करि, लिये संग सब लोग। चले चित्रकूटहि भरत ब्याकुल राम बियोग॥३॥

शब्दार्थ:

  • बेदबिहित = वैदिक विधि से
  • पितु करम = पिता का अंत्येष्टि-कर्म
  • करि = करके
  • लिये संग = साथ ले लिया
  • चले = चल पड़े
  • चित्रकूटहि = चित्रकूट को
  • ब्याकुल = व्याकुल
  • राम बियोग = श्रीराम के वियोग में

बेदबिहित पितु करम करि = वैदिक विधि से पिता का अंत्येष्टि-कर्म करके। चले चित्रकूटहि भरत = भरतजी चित्रकूट चल पड़े।

भावार्थ / व्याख्या:

वैदिक विधि से पिता का अंत्येष्टि-कर्म करके भरतजी ने सब लोगों को साथ ले लिया और श्रीराम के वियोग में व्याकुल होकर चित्रकूट की ओर चल पड़े।

इस दोहे में भरतजी का चरित्र निखरकर सामने आता है। शोक में डूबे रहने के बजाय उन्होंने पहले कर्तव्य पूरा किया — पिता का अंतिम संस्कार — और फिर समाधान की दिशा में कदम बढ़ाया।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा मिश्रित संकेत देता है। इसमें शोक भी है और कर्तव्य-पालन भी। यह उन प्रश्नों में मार्गदर्शन देता है जहाँ दुःख के बीच भी ज़िम्मेदारी निभानी हो। संदेश स्पष्ट है — पहले कर्तव्य पूरा करें, फिर समाधान खोजें।

शकुन फल:

यह शकुन कर्तव्य-पालन और समाधान की ओर बढ़ने का संकेत देता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • श्राद्ध, पितृकार्य या अंतिम संस्कार संबंधी विधि
  • शोक की स्थिति में निभाई जाने वाली ज़िम्मेदारी
  • किसी से मिलकर समस्या सुलझाने की यात्रा
  • परिवार को साथ लेकर लिया जाने वाला निर्णय
  • दुःख के बीच कर्तव्य निभाने की दुविधा

इस दोहे के आने पर कर्तव्य-पालन का मार्ग दिखाया गया है। पहले जो अनिवार्य कर्तव्य है उसे पूरा करें, फिर समाधान की ओर बढ़ें। स्वयं जाकर बात करना लाभदायक रहेगा।

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